Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi | सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की 5 प्रसिद्ध कविताएं

Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi

Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi: हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाने वाले सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फ़रवरी 1896 को बंगाल की मेदिनीपुर ज़िला में हुआ था। उनका बचपन का नाम सूर्यकुमार था। इस लेख में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की 5 प्रसिद्ध कवितायें लिखा गया है। जिसे आपको एक बार जरूर पढ़नी चाहिए।

Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi | सूर्यकान्त त्रिपाठी कविता

(1)

भिक्षुक – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

वह आता–
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।

 पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को ‌‌- भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

 साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?–
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

(2)

बापू, तुम मुर्गी खाते यदि – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो क्या भजते होते तुमको
ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे – ?
सर के बल खड़े हुए होते
हिंदी के इतने लेखक-कवि?

बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो लोकमान्य से क्या तुमने
लोहा भी कभी लिया होता?
दक्खिन में हिंदी चलवाकर
लखते हिंदुस्तानी की छवि,
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि?

बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो क्या अवतार हुए होते
कुल के कुल कायथ बनियों के?
दुनिया के सबसे बड़े पुरुष
आदम, भेड़ों के होते भी!
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि?

बापू, तुम मुर्गी खाते यदि
तो क्या पटेल, राजन, टंडन,
गोपालाचारी भी भजते- ?
भजता होता तुमको मैं औ´
मेरी प्यारी अल्लारक्खी !
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि !

(3)

मार दी तुझे पिचकारी – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

मार दी तुझे पिचकारी,
कौन री, रँगी छबि यारी ?

फूल -सी देह,- द्युति सारी,
हल्की तूल-सी सँवारी,
रेणुओं-मली सुकुमारी,
कौन री, रँगी छबि वारी ?

मुसका दी, आभा ला दी,
उर-उर में गूँज उठा दी,
फिर रही लाज की मारी,
मौन री रँगी छबि प्यारी।

(4)

गर्म पकौड़ी – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

गर्म पकौड़ी,
ऐ गर्म पकौड़ी!
तेल की भुनी,
नमक मिर्च की मिली,
ऐ गर्म पकौड़ी!
मेरी जीभ जल गयी,
सिसकियां निकल रहीं,
लार की बूंदें कितनी टपकीं,
पर दाढ़ तले दबा ही रक्‍खा मैंने।

 कंजूस ने ज्‍यों कौड़ी,
पहले तूने मुझको खींचा,
दिल लेकर फिर कपड़े-सा फींचा,
अरी, तेरे लिए छोड़ी,
बम्‍हन की पकाई,
मैंने घी की कचौड़ी।

(5)

शरण में जन, जननि – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

अनगिनित आ गये शरण में जन, जननि-
सुरभि-सुमनावली खुली, मधुऋतु अवनि!
स्नेह से पंक – उर हुए पंकज मधुर,
ऊर्ध्व – दृग गगन में देखते मुक्ति-मणि!
बीत रे गयी निशि, देश लख हँसी दिशि,
अखिल के कण्ठ की उठी आनन्द-ध्वनि।

(6)

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

(7)

टूटें सकल बन्ध – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

टूटें सकल बन्ध
 कलि के, दिशा-ज्ञान-गत हो बहे गन्ध।

 रुद्ध जो धार रे
शिखर – निर्झर झरे
मधुर कलरव भरे
शून्य शत-शत रन्ध्र।

रश्मि ऋजु खींच दे
चित्र शत रंग के,
वर्ण – जीवन फले,
जागे तिमिर अन्ध।

(8)

ध्वनि – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता

अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

 हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर

 पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त।

 मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
इसमें कहाँ मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अन्त।

दोस्तों आशा करता हूँ की इस लेख में लिखा गया Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi आपको जरूर पसंद आया होगा। यदि यह लेख आपको अच्छी लगी हो तो आप इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे। धन्यबाद।

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