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Short Stories in Hindi | Short Stories with Moral for Kids

Short Stories in Hindi : पहले के समय में कोई स्मार्टफोन नहीं होता था इसलिए अधिक्तर दीदी अपने नाती, पोता को रात को सोनो के वक्त कहानियां सुनाती थी हम बचपन से कहानियां सुनते बड़े होते है कहानियां जो हम बिलकुल ध्यान से सुनते है वह हमारी ज्ञान, बिद्धि , विवेक आदि को बढ़ावा देती है और जीवन में सही तरह से जीने का सिख मिलता है जिससे भविष्य में सफल व्यक्ति बनने में सहायता मिलता है। 

वर्तमान समय में कम लेकिन पहले के समय में अधिकतर छोटे-छोटे बच्चे दादा-दादी से राजा-रानी, परियों की, जानवरों की हिंदी कहानी, भूतों की कहानी सुनते है बच्चो को Short Hindi Stories सुनने में बड़ा मजा आता है इसलिए आज इस लेख में हम Short Stories Hindi में उपलब्ध कराये है जिसे आपको पढने में बड़ा मजा आयेंगे।

Short Stories in Hindi

Table of Contents

Short Moral Stories in Hindi

अक्लमंद हंस [1]

एक बहुत बडा विशाल पेड था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे। उनमें एक बहुत स्याना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी । सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा “देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।”

एक युवा हंस हंसते हुए बोला “ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी ?” स्याने हंस ने समझाया ” आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही हैं। धीरे-धीरे यह पेड के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड पर चढने के लिए सीढी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढी के सहारे चढकर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे।”

दूसरे हंस को यकीन न आया “एक छोटी सी बेल कैसे सीढी बनेगी?” तीसरा हंस बोला ” ताऊ, तु तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लम्बा कर रहा है। ” एक हंस बडबडाया ” यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा हैं। “इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी ?

समय बीतता रहा। बेल लिपटते- लिपटह्टे ऊपर शाखों तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरु हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढी बन गई। जिस पर आसानी से चढा जा सकता था। सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी । एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिआ उधर आ निकला ।

पेड पर बनी सीढी को देखते ही उसने पेड पर चढकर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए पेड पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फडफडाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था। एक हंस ने हिम्मत करके कहा ” ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो । ‘

दूसरा हंस बोला “इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे।” सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया “मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना । बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पडे रहना । जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड जाना ।”

सुबह बहेलिया आया। हंसो ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया।

सीखः बुद्धिमानों की सलाह गंभीरता से लेनी चाहिए।

सिंह और सियार – Short Stories in Hindi for Kids [2]

वर्षों पहले हिमालय की किसी कन्दरा में एक बलिष्ठ शेर रहा करता था। एक दिन वह एक भैंसे का शिकार और भक्षण कर अपनी गुफा को लौट रहा था। तभी रास्ते में उसे एक मरियल-सा सियार मिला जिसने उसे लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया। जब शेर ने उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा, “सरकार मैं आपका सेवक बनना चाहता हूँ। कुपया मुझे आप अपनी शरण में ले लें। मैं आपकी सेवा करूँगा और आपके द्वारा छोड़े गये शिकार से अपना गुजर-बसर कर लूंगा । ” शेर ने उसकी बात मान ली और उसे मित्रवत अपनी शरण में रखा।

कुछ ही दिनों में शेर द्वारा छोड़े गये शिकार को खा-खा कर वह सियार बहुत मोटा हो गया। प्रतिदिन सिंह के पराक्रम को देख-देख उसने भी स्वयं को सिंह का प्रतिरुप मान लिया। एक दिन उसने सिंह से कहा, ” अरे सिंह ! मैं भी अब तुम्हारी तरह शक्तिशाली हो गया हूँ। आज मैं एक हाथी का शिकार करूँगा और उसका भक्षण करुँगा और उसके बचे-खुचे माँस को तुम्हारे लिए छोड़ दूँगा ।” चूँकि सिंह उस सियार को मित्रवत् देखता था, इसलिए उसने उसकी बातों का बुरा न मान उसे ऐसा करने से रोका । भ्रम जाल में फँसा वह दम्भी सियार सिंह के परामर्श को अस्वीकार करता हुआ पहाड़ की चोटी पर जा खड़ा हुआ।

करता हुआ पहाड़ की चोटी पर जा खड़ा हुआ। वहाँ से उसने चारों और नज़रें दौड़ाई तो पहाड़ के नीचे हाथियों के एक छोटे से समूह को देखा। फिर सिंह- नाद की तरह तीन बार सियार की आवाजें लगा कर एक बड़े हाथी के ऊपर कूद पड़ा। किन्तु हाथी के सिर के ऊपर न गिर वह उसके पैरों पर जा गिरा। और हाथी अपनी मस्तानी चाल से अपना अगला पैर उसके सिर के ऊपर रख आगे बढ़ गया। क्षण भर में सियार का सिर चकनाचूर हो गया और उसके प्राण पखेरु उड़ गये।

पहाड़ के ऊपर से सियार की सारी हरकतें देखता हुआ सिंह ने तब यह गाथा कही – होते हैं जो मूर्ख और घमण्डी होती है उनकी ऐसी ही गति।”

सीखः कभी भी जिंदगी में किसी भी समय घमण्ड नहीं करना चाहिए।

सांड और गीदड – Story For Kids In Hindi [3]

एक किसान के पास एक बिगडैल सांड था । उसने कई पशु सींग मारकर घायल कर दिए। आखिर तंग आकर उसने सांड को जंगल की ओर खदेड़ दिया।

सांड जिस जंगल में पहुंचा, वहां खूब हरी घास उगी थी। आजाद होने के बाद सांड के पास दो ही काम रह गए। खूब खाना, हुंकारना तथा पेडों के तनों में सींग फंसाकर जोर लगाना। सांड पहले से भी अधिक मोटा हो गया। सारे शरीर में ऐसी मांसपेशियां उभरी जैसे चमडी से बाहर छलक ही पडेंगी। पीठ पर कंधो के ऊपर की गांठ बढती बढती धोबी के कपड़ों के गट्ठर जितनी बड़ी हो गई । गले में चमडी व मांस की तहों की तहें लटकने लगीं।

उसी वन में एक गीदड व गीदडी का जोड़ा रहता था, जो बड़े जानवरों द्वारा छोडे शिकार को खाकर गुजारा चलाते थे। स्वयं वह केवल जंगली चूहों आदि का ही शिकार कर पाते थे। संयोग से एक दिन वह मतवाला सांड झूमता हुआ उधर ही आ निकला जिदर गीदड – गीदडी रहते थे। गीदडी ने उस सांड को देखा तो उसकी आंखे फटी की फटी रह गईं। उसने आवाज देकर गीदड को बाहर बुलाया और बोली “देखो तो इसकी मांस-पेशियां। इसका मांस खाने में कितना स्वादिष्ट होगा। आह,

भगवान ने हमें क्या स्वादिष्ट तोहफा भेजा हैं। गीदड ने गीदडी को समझाया “सपने देखना छोडो। उसका मांस कितना ही चर्बीला और स्वादिष्ट हो, हमें क्या लेना ।” गीदडी भड़क उठी “तुम तो भौंदू हो। देखते नहीं उसकी पीठ पर जो चर्बी की गांठ हैं, वह किसी भी समय गिर जाएगी। हमें उठाना भर होगा और इसके गले में जो मांस की तहें नीचे लटक रही हैं, वे किसी भी समय टूटकर नीचे गिर सकती हैं। बस हमें इसके पीछे-पीछे चलते रहना होगा । “

गीदड बोला “भाग्यवान! यह लालच छोडो। “गीदडी जिद करने लगी “तुम हाथ में आया मौका अपनी कायरता से गंवाना चाहते हो। तुम्हें मेरे साथ चलना होगा। मैं अकेली कितना खा पाऊंगी?” गीदडी की हठ के सामने गीदड की कुछ भी न चली। दोनों ने सांड के पीछे-पीछे चलना शुरु किया। सांड के पीछे चलते-चलते उन्हें कई दिन हो गए, पर सांड के शरीएर से कुछ नहीं गिरा। गीदड ने बार-बार गीदडी को समझाने की कोशिश की ” गीदडी ! घर चलते हैं एक-दो चूहे मारकर पेट की आग बुझाते हैं।

गीदडी की अक्ल पर तो पर्दा पड गया था। वह न मानी “नहीं, हम खाएंगे तो इसी का मोटा-तजा स्वादिष्ट मांस। कभी न कभी तो यह गिरेगा ही । ” बस दोनों सांड के पीछे लगे रहे। भूखे प्यासे एक दिन दोनों गिर पड़े और फिर न उठ सके।

सीखः अधिक लालच का फल सदा बुरा होता हैं।

सच्चे मित्र – Short Moral Stories in Hindi for Class 3 [4]

बहुत समय पहले की बात हैं। एक सुदंर हरे-भरे वन में चार मित्र रहते थे। उनमें से एक था चूहा, दूसरा कौआ, तीसरा हिरण और चौथा कछुआ । अलग-अलगजाति के होने के बावजूद उनमें बहुत घनिष्टता थी। चारों एक-दूसरे पर जान छिडकते थे। चारों घुल-मिलकर रहते, खूब बातें करते और खेलते । वन में एक निर्मल जल का सरोवर था, जिसमें वह कछुआ रहता था। सरोवर के तट के पास ही एक जामुन का बडा पेड था। उसी पर बने अपने घोंसले में कौवा रहता था।

पेड़ के नीचे जमीन में बिल बनाकर चूहा रहता था और निकट ही घनी झाडियों में ही हिरण का बसेरा था। दिन को कछुआ तट के रेत में धूप सेकता रहता पानी में डुबकियां लगाता। बाकी तिन मित्र भोजन की तलाश में निकल पडते और दूर तक घूमकर सूर्यास्त के समय लौट आते। चारों मित्र इकट्ठे होते एक दूसरे के गले लगते, खेलते और धमाचौकड़ी मचाते।

एक दिन शाम को चूहा और कौवा तो लौट आए, परन्तु हिरण नहीं लौटा। तीनो मित्र बैठकर उसकी राह देखने लगे। उनका मन खेलने को भी नहीं हुआ। कछुआ भर्राए गले से बोला “वह तो रोज तुम दोनों से भी पहले लौट आता था। आज पता नहीं, क्या बात हो गई, जो अब तक नहीं आया। मेरा तो दिल डूबा जा रहा हैं।

चूहे ने चिंतित स्वर में कहा “हां, बात बहुत गंभीर हैं। जरूर वह किसी मुसीबत में पड गया हैं। अब हम क्या करे?” कौवे ने ऊपर देखते हुए अपनी चोंच खोली “मित्रो, वह जिधर चरने प्रायः जाता हैं, उधर मैं उड़कर देख आता, पर अंधेरा घिरने लगा हैं। नीचे कुछ नजर नहीं आएगा। हमें सुबह तक प्रतीक्षा करनी होगी। सुबह होते ही मैं उड़कर जाऊंगा और उसकी कुछ खबर लाकर तुम्हें दूंगा।”

कछुए ने सिर हिलाया ” अपने मित्र की कुशलता जाने बिना रात को नींद कैसे आएगी? दिल को चैन कैसे पडेगा? मैं तो उस ओर अभी चल पडता हूं मेरी चाल भी बहुत धीमी हैं तुम दोनों सुबह आ जाना।” चूहा बोला “मुझसे भी हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा जाएगा । मैं भी कछुए भाई के साथ चल पड सकता हूं, कौए भाई, तुम पौ फटते ही चल पडना।”

कछुआ और चूहा तो चल दिए। कौवे ने रात आंखो – आंखो में काटी। जैसे ही पौ फटी, कौआ उड चला उडते-उडते चारों ओर नजर डालता जा रहा था। आगे एक स्थान पर कछुआ और चूहा जाते उसे नजर आए कौवे ने कां कां करके उन्हें सूचना दी कि उन्हें देख लिया हैं और वह खोज में आगे जा रहा हैं। अब कौवे ने हिरण को पुकारना भी शुरु किया “मित्र हिरण, तुम कहां हो? आवाज दो मित्र।

तभी उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। स्वर उसके मित्र हिरण का सा था। उस आवाज की दिशा में उड़कर वह सीधा उस जगह पहुंचा, जहां हिरण एक शिकारी के जाल में फंसा चटपटा रहा था । हिरण ने रोते हुए बताया कि कैसे एक निर्दयी शिकारी ने वहां जाल बिछा रखा था। दुर्भाग्यवश वह जाल न देख पाया और फंस गया। हिरण सुबका “शिकारी आता ही होगा वह मुझे पकडकर ले जाएगा और मेरी कहानी खत्म समझो। मित्र कौवे ! तुम चूहे और कछुए को भी मेरा अंतिम नमस्कार कहना।”

कौआ बोला “मित्र, हम जान की बाजी लगाकर भी तुम्हें छुड़ा लेंगे।” हिरण ने निराशा व्यक्त की “लेकिन तुम ऐसा कैसे कर पाओगे?” कौवे ने पंख फडफडाए “सुनो, मैं अपने मित्र चूहे को पीठ पर बिठाकर ले आता हूं। वह अपने पैने दांतो से जाल कुतर देगा।” हिरण को आशा की किरण दिखाई दी। उसकी आंखे चमक उठीं “तो मित्र, चूहे भाई को शीघ्र ले आओ।”

कौआ उड़ा और तेजी से वहां पहुंचा, जहां कछुआ तथा चूहा आ पहुंचे थे। कौवे ने समय नष्ट किए बिना बताया ” मित्रो, हमारा मित्र हिरण एक दुष्ट शिकारी के जाल में कैद हैं। जान की बाजी लगी हैं शिकारी के आने से पहले हमने उसे न छुडाया तो वह मारा जायेगा।” कछुआ हकलाया ” उसके लिए हमें क्या करना होगा? जल्दी बताओ?” चूहे के तेज दिमाग ने कौवे का इशारा समझ लिया था ” घबराओ मत। कौवे भाई, मुझे अपनी पीठ पर बैठाकर हिरण के पास चलो।”

चूहे को जाल कुतरकर हिरण को मुक्त करने में अधिक देर नहीं लगी। मुक्त होते ही हिरण अपने मित्रों को गले लगा लिया और रुंधे गले से उन्हें धन्यवाद दिया। तभी कछुआ भी वहां आ पहुचा और खुशी के आलम में शामिल हो गया। हिरण बोला “मित्र, आप भी आ गए। मैं भाग्यशाली हूं, जिसे ऐसे सच्चे मित्र मिले हैं। ” ।

चारों मित्र भाव विभोर होकर खुशी में नाचने लगे। एकाएक, हिरण चौंका और उसने मित्रों को चेतावनी दी ” भाइयो, देखो वह जालिम शिकारी आ रहा हैं। तुरंत छिप जाओ।” चूहा फौरन पास के एक बिल में घुस गया। कौआ उड़कर पेड की ऊंची डाल पर जा बैठा। हिरण एक ही छलांग में पास की झाडी में जा घुसा व ओझल हो गया। परंतु मंद गति का कछुआ दो कदम भी न जा पाया था कि शिकारी आ धमका।

उसने जाल को कटा देखकर अपना माथा पीटा “क्या फंसा था और किसने काटा?” यह जानने के लिए वह पैरों के निशानों के सुराग ढूंढने के लिए इधर-उधर देख ही रहा था कि उसकी नजर रेंगकर जाते कछुए पर पडी। उसकी आंखें चमक उठी “वाह! भागते चोर की लंगोटी ही सही। अब यही कछुआ मेरे परिवार के आज के भोजन के काम आएगा।”

बस उसने कछुए को उठाकर अपने थैले में डाला और जाल समेटकर चलने लगा। कौवे ने तुरंत हिरण व चूहे को बुलाकर कहा “मित्रो, हमारे मित्र कछुए को शिकारी थैले में डालकर ले जा रहा हैं। ” चूहा बोला “हमें अपने मित्र को छुडाना चाहिए। लेकिन कैसे ?”

इस बार हिरण ने समस्या का हल सुझाया ” मित्रो, हमें चाल चलनी होगी। मैं लंगडाता हुआ शिकारी के आगे निकलूंगा। मुझे लंगडा जान वह मुझे पकडने के लिए कछुए वाला थैला छोड मेरे पीछे दौडेगा । मैं उसे दूर ले जाकर चकमा दूंगा। इस बीच चूहा भाई थैले को कुतरकर कछुए को आजाद कर देगें। बस ।” योजना अच्छी थी लंगडाकर चलते हिरण को देख शिकारी की बांछे खिल उठी वह थैला पटककर हिरण के पीछे भागा।

हिरण उसे लंगडाने का नाटक कर घने वन की ओर ले गया और फिर चौकडी भरता ‘यह जा वह जा’ हो गया। शिकारी दांत पीसता रह गया। अब कछुए से ही काम चलाने का इरादा बनाकर लौटा तो उसे थैला खाली मिला। उसमें छेद बना हुआ था। शिकारी मुंह लटकाकर खाली हाथ घर लौट गया।

सीखः सच्चे मित्र हों तो जीवन में मुसीबतों का आसानी से सामना किया जा सकता हैं।

आपस की फूट – Small Moral Stories in Hindi [5]

प्राचीन समय एक विचित्र पक्षी रहता था। उसका धड एक ही था, परन्तु सिर दो थे नाम था उसका भारुंड। एक शरीर होने के बावजूद उसके सिरों में एकता नहीं थी और न ही था तालमेल । वे एक दूसरे से बैर रखते थे। हर जीव सोचने समझने का काम दिमाग से करता हैं और दिमाग होता हैं सिर में दो सिर होने के कारण भारुंड के दिमाग भी दो थे जिनमें से एक पूरब जाने की सोचता तो दूसरा पश्चिम फल यह होता था कि टांगें एक कदम पूरब की ओर चलती तो अगला कदम पश्चिम की ओर और भारूड स्वयं को वहीं खड़ा पाता ता ।

भारुंड का जीवन बस दो सिरों के बीच रस्साकसी बनकर रह गया था। एक दिन भारुंड भोजन की तलाश में नदी तट पर धूम रहा था कि एक सिर को नीचे गिरा एक फल नजर आया। उसने चोंच मारकर उसे चखकर देखा तो जीभ चटकाने लगा “वाह! ऐसा स्वादिष्ट फल तो मैंने आज तक कभी नहीं खाया। भगवान ने दुनिया में क्या-क्या चीजें बनाई हैं।”

“अच्छा! जरा मैं भी चखकर देखूं।” कहकर दूसरे ने ” अपनी चोंच उस फल की ओर बढाई ही थी कि पहले सिर ने झटककर दूसरे सिर को दूर फेंका और बोला ” अपनी गंदी चोंच इस फल से दूर ही रख। यह फल मैंने पाया हैं और इसे मैं ही खाऊंगा।” अरे ! हम दोनों एक ही शरीर के भाग हैं। खाने-पीने की चीजें तो हमें बांटकर खानी चाहिए ।

” दूसरे सिर ने दलील दी। पहला सिर कहने लगा “ठीक! हम एक शरीर के भाग हैं। पेट हमार एक ही हैं। मैं इस फल को खाऊंगा तो वह पेट में ही तो जाएगा और पेट तेरा भी हैं।” दूसरा सिर बोला “खाने का मतलब केवल पेट भरना ही नहीं होता भाई । जीभ का स्वाद भी तो कोई चीज हैं। तबीयत को संतुष्टि तो जीभ से ही मिलती हैं। खाने का असली मजा तो मुंह में ही हैं। “

पहला सिर तुनकर चिढाने वाले स्वर में बोला “मैंने तेरी जीभ और खाने के मजे का ठेका थोडे ही ले रखा हैं। फल खाने के बाद पेट से डकार आएगी। वह डकार तेरे मुंह से भी निकलेगी। उसी से गुजारा चला लेना। अब ज्यादा बकवास न कर और मुझे शांति से फल खाने दे।” ऐसा कहकर पहला सिर चटकारे ले-लेकर फल खाने लगा।

इस घटना के बाद दूसरे सिर ने बदला लेने की ठान ली और मौके की तलाश में रहने लगा। कुछ दिन बाद फिर भारुंड भोजन की तलाश में घूम रहा था कि दूसरे सिर की नजर एक फल पर पडी । उसे जिस चीज की तलाश थी, उसे वह मिल गई थी। दूसरा सिर उस फल पर चोंच मारने ही जा रहा था कि कि पहले सिर ने चीखकर चेतावनी दी “अरे, अरे!

एक और एक ग्यारह – Simple Short Motivation Stories in Hindi [6]

एक बार की बात हैं कि बनगिरी के घने जंगल में एक उन्मुक्त हाथी ने भारी उत्पात मचा रखा था। वह अपनी ताकत के नशे में चूर होने के कारण किसी को कुछ हीं समझता था। बनगरी में ही एक पेड पर एक चिडिया व चिडे का छोटा-सा सुखी संसार था। चिडिया अंडो पर बैठी नन्हें-नन्हें प्यारे बच्चों के निकलने के सुनहरे सपने देखती रहती । एक दिन क्रूर हाथी गरजता, चिंघाडता पेड़ों को तोडता-मरोडता उसी ओर आया। देखते ही देखते उसने चिडिया के घोंसले वाला पेड भी तोड डाला। घोंसला नीचे आ गिरा। अंडे टूट गए और ऊपर से हाथी का पैर उस पर पडा,

चिडिया और चिडा चीखने चिल्लाने के सिवा और कुछ न कर सके। हाथी के जाने के बाद चिडिया छाती पीट-पीटकर रोने लगी। तभी वहां कठफोठवी आई। वह चिडिया की अच्छी मित्र थी। कठफोडवी ने उनके रोने का कारण पूछा तो चिडिया ने अपनी सारी कहानी कह डाली । कठफोडवी बोली “इस प्रकार गम में डूबे रहने से कुछ नहीं होगा। उस हाथी को सबक सिखाने के लिए हमे कुछ करना होगा।”

चिडिया ने निराशा दिखाई “हमें छोटे-मोटे जीव उस बलशाली हाथी से कैसे टक्कर ले सकते हैं?” कठफोडवी ने समझाया ” एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं। हम अपनी शक्तियां जोडेंगे।

“कैसे?” चिडिया ने पूछा। “मेरा एक मित्र वीं आख नामक भंवरा हैं। हमें उससे सलाह लेना चाहिए ।” चिडिया और कठफोडवी भंवरे से मिली। भंवरा गुनगुनाया “यह तो बहुत बुरा हुआ। मेरा एक मेंढक मित्र हैं आओ, उससे सहायता मांगे।” अब तीनों उस सरोवर के किनारे पहुंचे, जहां वह मेढक रहता था। भंवरे ने सारी समस्या बताई। मेंढक भर्याये ये स्वर में बोला ” आप लोग धैर्य से जरा यहीं मेरी प्रतीक्षा करें। मैं गहरे पाने में बैठकर सोचता हूं।”

ऐसा कहकर मेंढक जल में कूद गया। आधे घंटे बाद वह पानी से बाहर आया तो उसकी आंखे चमक रही थी। वह बोला “दोस्तो ! उस हत्यारे हाथी को नष्ट करने की मेरे दिमाग में एक बडी अच्छी योजना आई हैं। उसमें सभी का योगदान होगा।” मेंढक ने जैसे ही अपनी योजना बताई, सब खुशी से उछल पडे। योजना सचमुच ही अदभुत थी। मेंढक ने दोबारा बारी-बारी सबको अपना-अपना रोल समझाया।

कुछ ही दूर वह उन्मत्त हाथी तोडफोड मचाकर व पेट भरकर कोंपलों वाली शाखाएं खाकर मस्ती में खडा झूम रहा था। पहला काम भंवरे का था। वह हाथी के कानों के पास जाकर मधुर राग गुंजाने लगा। राग सुनकर हाथी मस्त होकर आंखें बंद करके झूमने लगा।

तभी कठफोडवी ने अपना काम कर दिखाया। वह् आई और अपनी सुई जैसी नुकीली चोंच से उसने तेजी से हाथी की दोनों आंखें बींध डाली। हाथी की आंखे फूट गईं। वह तडपता हुआ अंधा होकर इधर-उधर भागने लगा।जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, हाथी का क्रोध बढ़ता जा रहा था। आंखों से नजर न आने के कारण ठोकरों और टक्करों से शरीर जख्मी होता जा रहा था। जख्म उसे और चिल्लाने पर मजबूर कर रहे थे।

चिडिया कृतज्ञ स्वर में मेढक से बोली “बहिया, मैं आजीवन तुम्हारी आभारी रहूंगी। तुमने मेरी इतनी सहायता कर दी। “मेढक ने कहा “आभार मानने की जरुरत नहीं। मित्र ही मित्रों के काम आते हैं।”एक तो आंखों में जलन और ऊपर से चिल्लाते-चिंघाडते हाथी का गला सूख गया। उसे तेज प्यास लगने लगी। अब उसे एक ही चीज की तलाश थी, पानी । मेढक ने अपने बहुत से बंधु-बांधवों को इकट्ठा किया और उन्हें ले जाकर दूर बहुत बडे गड्ढे के किनारे बैठकर टर्राने के लिए कहा। सारे मेढक टर्राने लगे।

मेढक की टर्राहट सुनकर हाथी के कान खडे हो गए। वह यह जानता ता कि मेढक जल स्त्रोत के निकट ही वास करते हैं। वह उसी दिशा में चल पड़ा। टर्राहट और तेज होती जा रही थी प्यासा हाथी और तेज भागने लगा। जैसे ही हाथी गड्ढे के निकट पहुंचा, मेढकों ने पूरा जोर लगाकर टर्राना शुरु किया। हाथी आगे बढा और विशाल पत्थर की तरह गड्ढे में गिर पड़ा, जहां उसके प्राण पखेरु उडते देर न लगे इस प्रकार उस अहंकार में डूबे हाथी का अंत हुआ।

सीख : 1. एकता में बल हैं। 2. अहंकारी का देर या सबेर अंत होता ही हैं।

एकता का बल – Good Short Moral Stories in Hindi [7]

एक समय की बात हैं कि कबूतरों का एक दल आसमान में भोजन की तलाश में उड़ता हुआ जा रहा था। गलती से वह दल भटककर ऐसे प्रदेश के ऊपर से गुजरा, जहां भयंकर अकाल पडा था। कबूतरों का सरदार चिंतित था। कबूतरों के शरीर की शक्ति समाप्त होती जा रही थी। शीघ्र ही कुछ दाना मिलना जरुरी था। दल का युवा कबूतर सबसे नीचे उड रहा था। भोजन नजर आने पर उसे ही बाकी दल को सुचित करना था। बहुत समय उडने के बाद कहीं वह सूखाग्रस्त क्षेत्र से बाहर आया ।

नीचे हरियाली नजर आने लगी तो भोजन मिलने की उम्मीद बनी। युवा कबूतर और नीचे उडान भरने लगा। तभी उसे नीचे खेत में बहुत सारा अन्न बिखरा नजर आया “चाचा, नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पड़ा हैं। हम सबका पेट भर जाएगा।’ सरदार ने सूचना पाते ही कबूतरों को नीचे उतरकर खेत में बिखरा दाना चुनने का आदेश दिया।

सारा दल नीचे उतरा और दाना चुनने लगा। वास्तव में वह दाना पक्षी पकडने वाले एक बहलिए ने बिखेर रखा था। ऊपर पेड पर तना था उसका जाल । जैसे ही कबूतर दल दाना चुगने लगा, जाल उन पर आ गिरा। सारे कबूतर फंस गए। कबूतरों के सरदार ने माथा पीटा “ओह! यह तो हमें फंसाने के लिए फैलाया गया जाल था। भूख ने मेरी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। मुझे सोचना चाहिए था कि इतना अन्न बिखरा होने का कोई मतलब हैं। अब पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत ?”

एक कबूतर रोने लगा “हम सब मारे जाएंगे।” बाकी कबूतर तो हिम्मत हार बैठे थे, पर सरदार गहरी सोच में डूबा था। एकाएक उसने कहा “सुनो, जाल मजबूत हैं यह ठीक हैं, पर इसमें इतनी भी शक्ति नहीं कि एकता की शक्ति को हरा सके। हम अपनी सारी शक्ति को जोड़े तो मौत के मुंह में जाने से बच सकते हैं। “युवा कबूतर फडफडाया “चाचा! साफ-साफ बताओ तुम क्या कहना चाहते हो । जाल ने हमें तोड रखा हैं, शक्ति कैसे जोडे ?”

सरदार बोला “तुम सब चोंच से जाल को पकडो, फिर जब मैं फुर्र कहूं तो एक साथ जोर लगाकर उडना ।”सबने ऐसा ही किया। तभी जाल बिछाने वाला बहेलियां आता नजर आया। जाल में कबूतर को फंसा देख उसकी आंखें चमकी। हाथ में पकड़ा डंडा उसने मजबूती से पकडा व जाल की ओर दौड़ा। बहेलिया जाल से कुछ ही दूर था कि कबूतरों का सरदार बोला “फुर्रर्रर्र !”

सारे कबूतर एक साथ जोर लगाकर उडे तो पूरा जाल हवा में ऊपर उठा और सारे कबूतर जाल को लेकर ही उडने लगे। कबूतरों को जाल सहित उडते देखकर बहेलिया अवाक रह गया। कुछ संभला तो जाल के पीछे दौडने लगा। कबूतर सरदार ने बहेलिए को नीचे जाल के पीछे दौडते पाया तो उसका इरादा समझ गया। सरदार भी जानता था कि अधिक देर तक कबूतर दल के लिए जाल सहित उडते रहना संभव न होगा।

पर सरदार के पास इसका उपाय था। निकट ही एक पहाडी पर बिल बनाकर उसका एक चूहा मित्र रहता था। सरदार ने कबूतरों को तेजी से उस पहाड़ी की ओर उड़ने का आदेश दिया । पहाडी पर पहुंचते ही सरदार का संकेत पाकर जाल समेत कबूतर चूहे के बिल के निकट उतरे।

सरदार ने मित्र चूहे को आवाज दी। सरदार ने संक्षेप में चूहे को सारी घटना बताई और जाल काटकर उन्हें आजाद करने के लिए कहा। कुछ ही देर में चूहे ने हाल काट दिया। सरदार ने अपने मित्र चूहे को धन्यवाद दिया और सारा कबूतर दल आकाश की ओर आजादी की उडान भरने लगा।

चूहा और बैल – Short Story With Moral In Hindi [8]

एक नन्हा सा चूहा था। वह अपने बिल से बाहर आया। उसने देखा कि एक बड़ा बैल पेड़ की छाया में सोया हुआ है। बैल जोर-जोर से खर्राटें भर रहा था। चूहा बैल की नाक के पास गया और मजा लेने के लिए उसने उसकी नाक में काट लिया।

बैल हड़बड़ा कर जाग गया। दर्द के मारे वह जोर से डकारा। इससे घबरा कर चूहा सरपट भागा । बैल ने पूरी ताकत से उसका पीछा किया। चूहा दौडकर झटपट दीवार के छेद में घुस गया। अब वह बैल की पहुँच से बाहर था।

पर बैल ने चूहे को सजा देने की ठान ली थी। उसने गुस्से से चिल्लाकर कहा, “अबे नालायक! मैं तुझे एक ताकतवर बैल को काटने का मजा चखाऊँगा।” बैल ताकतवर था । उसने अपने सिर से दीवार पर जोर से धक्का मारा। पर दीवार भी बहुत मजबूत थी। उस पर कोई असर नही हुआ, बल्कि बैल के सिर में ही चोट लगी । यह देख कर चूहे ने बैल को चिढ़ाते हुए कहा, “अरे मूर्ख, बिना मतलब अपना सिर क्यों फोड़ रहा है? तू कितना ही बलवान क्यों न हो, पर हमेशा तेरे मन की तो नहीं हो सकती।”

नालायक! मैं तुझे एक ताकतवर बैल को काटने का मजा चखाऊँगा।” बैल ताकतवर था । उसने अपने सिर से दीवार पर जोर से धक्का मारा। पर दीवार भी बहुत मजबूत थी। उस पर कोई असर नही हुआ, बल्कि बैल के सिर में ही चोट लगी। यह देख कर चूहे ने बैल को चिढ़ाते हुए कहा, “अरे मूर्ख, बिना मतलब अपना सिर क्यों फोड़ रहा है? तू कितना ही बलवान क्यों न हो, पर हमेशा तेरे मन की तो नहीं हो सकती । “

बैल अब भी चूहे को बिना दंड दिए छोड़ देने को तैयार नहीं था। चूहे जैसे एक तुच्छ प्राणी ने उसका अपमान किया था। इस समय वह बहुत क्रोध में था।पर धीरे-धीरे उसका जोश कम हुआ। उसे चूहे की बात सही मालूम हुई। इसलिए वह चुपचाप वहाँ से चला गया।

चूहे के ये शब्द अब भी उसके कान में गूँज रहे थे तू कितना ही बलवान क्यों न हो, पर हमेशा तेरे ही मन की तो नहीं हो सकती।

शिक्षा – बुद्धि शक्ति से बड़ी होती है।

प्यासा कौवा – Short Stories In Hindi [9]

गर्मियो के दिन थे। एक कौआ बहुत प्यासा था। उसका गला सूख रहा था।

वह इधर-उधर उड़ता हुआ पानी की तलाश कर रहा था। पर उसे कहीं भी पानी नही दिखाई दिया। सभी जलाशय सूख गये थे।

अंत में कौए को एक मकान के पास एक घड़ा दिखाई दिया। वह घड़े के पास गया। उसने उसमें झाँककर देखा । घड़े में थोड़ा-सा पानी था। पर उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुँच सकती थी।

आचानक उसे एक उपाय सूझा। वह जमीन से एक-एक कंकड़ उठाकर घड़े में डालने लगा। धीरे-धीरे घड़े का पानी ऊपर आने लगा। अब कौए की चोंच पानी तक पहुँच सकती थी । कौए ने जी भर कर पानी पिया और खुशी से काँव-काँव करता उड़ गया।

शिक्षा – जहाँ चाह, वहाँ राह !

चालाक लोमड़ी – Short Moral Stories in Hindi [10]

एक दिन एक भूखी लोमड़ी अंगूर के बगीचे में जा पहुँची बेलों पर पके हुए अंगूरों के गुच्छे लटक रहे थे।

यह देख लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया। मुँह ऊपर की ओर तानकर उसने अंगूर पाने की कोशिश की। पर वह सफल न हो सकी। अंगूर काफी ऊँचाई पर थे। उन्हें पाने के लिए लोमड़ी खूब उछली, फिर भी वह अंगूरों तक नहीं पहुँच सकी।

जब तक वह पूरी तरह थक नहीं गई, उछलती ही रही। आखिरकार थककर उसने उम्मीद छोड़ दी और वहाँ से चलती बनी। जाते-जाते उसने कहा, “अंगूर खट्टे हैं। ऐसे खट्टे अंगूर कौन खाए ?” ॥

शिक्षा – हार मानने में हर्ज क्या?

कछुआ और खरगोश – Hindi Short Stories [11]

कछुआ हमेशा धीरे-धीरे चलता था। कछुए की चाल देख खरगोश खूब हँसता एक दिन कछुए ने खरगोश से दौड़ की शर्त लगाई। दौड़ शुरू हुई। खरगोश खूब जोर दौड़ने लगा। वह जल्दी ही कछुए से काफी आगे निकल गया।

अपनी जीत निश्चित मान कर खरगोश सोचने लगा, अभी कछुआ बहुत पीछे हैं। वह धीरे धीरे चलता है। इतनी जल्दी शर्त जीतने की जरूरत क्या है? पेड़ के नीचे बैठकर थोड़ा आराम कर लूँ। जब कछुआ पास आता दिखाई देगा, तो दौड़कर मैं उससे आगे निकल जाऊँगा और शर्त जीत लूंगा। यह देख कर कछुआ खूब नाराज होगा। बड़ा मजा आयेगा।

खरगोश पेड़ की छाया में आराम करने लगा। कछुआ अब भी काफी पीछे था। थकान के कारण खरगोश को नींद आ गयी। जब उसकी आँख खुली तो उसने देखा कि कछुआ आगे चला गया है और विजय-रेखा पारकर मुस्करा रहा है।

खरगोश शर्त हार गया।

शिक्षा – धैर्य और लगन से काम करनेवाला विजयी होता है।

चालाक लोमड़ी – Short Moral Story in Hindi [12]

एक दिन एक कौए ने एक बच्चे के हाथ से एक रोटी छीन ली। उसके बाद वह उड़कर पेड़ की ऊँची डाली पर जा बैठा और रोटी खाने लगा। एक लोमड़ी ने उसे देखा तो उसके मुँह में पानी भर आया । वह पेड़ के नीचे जा पहुँची। उसने कौए की ओर देख कर कहा, कौए राजा, नमस्ते। आप अच्छे तो है? कौए ने कोई जवाब नही दिया।

लोमड़ी ने उससे कहा, कौए राजा, आप बहुत सुंदर एंव चमकदार लग रहे हैं। यदि आपकी वाणी भी मधुर है, तो आप पक्षियों के राजा बन जाएँगे। जरा मुझे अपनी आवाज तो सुनाइए मूर्ख कौए ने सोचा, मैं सचमुच पक्षियों का राजा हूँ। मुझे यह सिद कर देना चाहिये। उसने ज्यों ही गाने के लिए अपनी चोंच खोली रोटी चोंच से छूटकर नीचे आ गिरी।

लोमड़ी रोटी उठाकर फौरन भाग गयी।

शिक्षा – झूठी तारीफ करनेवाले से सावधान रहना चाहिए

ग्रामीण चूहा और शहरी चूहा – Bacchon Ki Kahani [13]

एक ग्रामीण चूहा था। वह खेत में रहता था। एक शहरी चूहा उसका मित्र था। वह शहर में रहता था। एक दिन ग्रामीण चूहे ने शहरी चूहे को खाने पर निमंत्रित किया। उसने अपने शहरी मेहमान को मीठे-मीठे बेर, मूंगफली के दाने तथा कंदमूल खाने को दिए। पर शहरी चूहे को गाँव का सादा भोजन पसंद नही आया। उसने ग्रामीण चूहे से कहा, भाई! सच्ची बात कहूँ तो तुम्हारा यह देशी खाना मुझे पसंद नही आया। यह तो बड़ा घटिया किस्म का खाना है। इसमें कोई स्वाद भी नहीं है। तुम मेरे घर चलो, तो तुम्हें पता चलेगा कि बढिया खाना कैसा होता है!

ग्रामीण चूहे ने शहरी चूहे का आमंत्रण स्वीकार कर लिया। एक दिन वह शहर गया। उसके शहरी मित्र ने उसे अजीर, खजूर, शहद, बिस्कुट, पावरोटी, मुरब्बा आदि खाने को दिया। भोजन बड़ा स्वादिष्ट था।

लेकिन शहर मे वे दोनो चैन से भोजन नही कर पाए। वहाँ बार-बार एक बिल्ली आ जाती चूहों को अपनी जान बचाने के लिये भागना पड़ता था। शहरी चूहे का बिल भी बहुत छोटा और सँकरा था।

कितना दुखी जीवन है तुम्हारा, भाई ? ग्रामीण चूहे ने शहरी चूहे से कहा, मैं तो घर लौट जाता हूँ। वहाँ मैं कम से कम शांतिपूर्वक खाना तो खा सकता हूँ। खेत में अपने स्थान पर वापस लौटने पर ग्रामीण चूहे को बड़ी प्रसन्नता हुई।

शिक्षा :- शांति और निर्भयता मे ही सच्चा सुख

मधुमक्खी और कबूतर – Moral Story In Hindi Short [14]

एक मधुमक्खी थी। एक बार वह उड़ती हुई तालाब के ऊपर से जा रही थी अचानक वह तालाब के पानी में गिर गई। उसके पंख गीले हो गए। अब वह उड़ नही सकती थी। उसकी मृत्यु निश्चित थी।

तालाब के पास पेड़ पर एक कबूतर बैठा हुआ था। उसने मधुमक्खी को पानी में डूबते हुए देखा। कबूतर ने पेड़ से एक पत्ता तोड़ा, उसे अपनी चोंच में उठाकर तालाब में मधुमक्खी के पास गिरा दिया। धीरे-धीरे मधुमक्खी उस पत्ते पर चढ़ गई। थोड़ी देर में उसके पंख सूख गये उसने कबूतर को धन्यवाद दिया। फिर वह उड़ कर दूर चली गई।

कुछ दिन के बाद कबूतर पर एक संकट आया । वह पेड़ की डाली पर आँख मूंद कर सो रहा था। तभी एक लड़के ने गुलेल से उस पर निशाना साधा। कबूतर इस खतरे से अनजान था। मगर मधुमक्खी ने लड़के को निशाना साधते हुए देख लिया था। मधुमक्खी उड़कर लड़के के पास पहुँची।

उसने लड़के के हाथ में डस लिया। लड़के के हाथ से गुलेल गिर पड़ी। दर्द के मारे वह जोर-जोर से चीखने लगा। लड़के की चीख सुनकर कबूतर जाग उठा। उसने अपनी जान बचाने के लिए मधुमक्खी को धन्यवाद दिया और मजे से उड़ गया।

शिक्षा – अच्छे लोग हमेशा दूसरो की मदद करते हैं।

लालची कुत्ता – Short Moral Stories in Hindi [15]

एक बार एक कुत्ते को हड्डी का एक टुकड़ा मिल गया। उसे अपने मुँह मे दबाकर वह एक कोने में जा बैठा। वह थोड़ी देर तक उस हड्डी के टुकड़े को चूसता रहा। बाद में थककर वहीं सो गया। जब उसकी नींद खुली तो उसे जोरों की प्यास लगी। मुँह मे हड्डी का टुकड़ा दबाए वह पानी की खोज में चल पड़ा।

वह एक नदी के किनारे गया। पानी पीने के लिये वह झुका, तो उसे पानी में अपनी ही छाया दिखाई दी। उसे लगा, नदी में कोई दूसरा कुत्ता है। उस कुत्ते के मुँह मे भी हड्डी का टुकड़ा है। कुत्ते के मन में इस हड्डी के टुकड़े को हथिया लेने का विचार आया। उसने गुस्से में आकर जैसे ही भौंकने के लिये मुँह खोला, तो उसके मुँह से हड्डी का टुकड़ा नदी मे जा गिरा। लालच में उसने अपने मुँह की हड्डी भी गँवा दी।

शिक्षा – लालच का फल बुरा होता है।

टिड्डा और चिट्टी – Small Story in Hindi [16]

गर्मियों के दिन थे। खुली धूप थी और मौसम साफ था। अनाज भी भरपूर था। ऐसे समय पर एक टिड्डा भरपेट खाना खाकर गीत गाने में मस्त था। उसने देखा, कुछ चींटियाँ खाने की सामग्री ले जा रही हैं।

शायद वे भविष्य के लिए संग्रह कर रही थीं। चींटियों को देखकर वह हँसने लगा। उनमे से एक चींटी से उसकी दोस्ती थी। टिड्डे ने उस चींटी से कहा, “तुम सब कितनी लालची हो! इस खुशी के मौके पर भी काम कर रही हो ! तरस आता है तुम पर!” चींटी ने जवाब दिया, “अरे भाई, हम लोग बरसात के लिए खाने की सामग्री एकत्र कर रही हैं। “

गर्मियों के बाद बरसात का मौसम शुरू हुआ। आकाश में बादल छा गए। खुली धूप जाती रही ! अब टिड्डे के लिए भोजन जुटाना मुश्किल हो गया। आखिरकार उसके सामने भूखों मरने की समस्या खड़ी हो गई।

एक दिन टिड्डे ने अपनी दोस्त चींटी का दरवाजा खटखटाया। उसने कहा, “चींटी बहन कृपा कर मुझे कुछ खाने के लिए दो। मैं बहुत भूखा हूँ ।” चींटी ने जवाब दिया, “गर्मी के दिनों में तो तुम गीत में मगन होकर इधर-उधर घूमते रहे, अब बरसात के मौसम में कही जाकर नाचो। तुम जैसे आलसी को मैं एक भी दाना नहीं दे सकती।” और उसने झट से दरवाजा बंद कर दिया।

शिक्षा : आज की बचत ही कल काम आती है।

किसान और जादुई बतख – Short Magic Stories in Hindi [17]

एक किसान के पास एक जादुई बतख थी। वह रोज एक सोने का अंडा देती थी। किसान सोने के अंडे को बाजार में बेच देता था। इससे उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी। थोड़े ही दिनों में किसान अमीर हो गया। उसने एक विशाल मकान बनवाया। इसमें वह अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ आनन्द से रहने लगा।

बहुत दिनों तक इसी प्रकार चलता रहा। एक दिन किसान ने सोचा, यदि मैं इस बतख के शरीर से सारे अंडे निकाल लूँ, तो मालामाल हो जाऊँगा।

किसान ने एक बड़ा-सा चाकू लिया और बतख का पेट चीर डाला। परंतु बतख के पेट में से उसे एक भी अंडा नही मिला। किसान को अपनी गलती पर बड़ा दुःख हुआ। वह पछताने लगा। उसकी हालत पागलों जैसी हो गयी। बतख मर गयी थी। उसे बतख से रोज एक सोने का अंडा मिलता था अब उसे वह कभी नही मिल सकता था।

शिक्षा – लालच बुरी बला है।

दो बकरे – Moral Stories In Hindi [18]

दो बकरे थे। एक काले रंग का था एक भूरे रंग का था । एक दिन वे झरने पर बने पुल से गुजर रहे थे। काला बकरा पुल के इस छोर से और भूरा बकरा उस छोर से आ रहा था। पुल के बीचो-बीच दोनों बकरो का आमना-सामना हुआ। दोनों अकड़कर खड़े हो गए। पुल बहुत ही सँकरा था। एक बार में उस पुल पर से एक ही जानवर पुल से जा सकता था।

काले बकरे ने भूरे बकरे से गुर्रा कर कहा, “तू मेरे रास्ते से हट जा ।” भूरे बकरे ने भी इसी प्रकार गुर्रा कर जवाब दिया, “अबे कालिए, वापस चला जा, वरना मैं तुझे इस झरने में फेंक दूँगा।”

वे दोनो थोडी देर तक एक-दूसरे को धमकाते रहे। उसके बाद दोनों एक दूसरे से भिड़ गए। फिर क्या था ! दोनों अपना-अपना संतुलन खो बैठे और लड़खड़ाकर झरने मे जा गिरे। वे झरने की धारा के साथ बहने लगे। थोड़ी देर में ही दोनों डूब मर गए।

इसी तरह दूसरी बार दो बकरियाँ इसी पुल के बीचोबीच आमने-सामने आ गईं। वे दोनो समझदार एंव शांत मिजाज वाली थीं। उनमें से एक बकरी बैठ गई। उसने दूसरी बकरी को अपने शरीर के ऊपर से जाने दिया। उसके बाद वह खड़ी हो गई। धीरे- धीरे चल कर उसने भी पुल पार कर लिया।

शिक्षा – क्रोध दुख का मूल है, शांति खुशी की खान है

शेर और चूहा – Small Moral Stories in Hindi [19]

गर्मी के दिन थे। दोपहरी में एक शेर पेड़ की छाया में सो रहा था। उसी पेड़ के पास बिल में एक चूहा रहता था। वह खेलने के लिये अपने बिल से बाहर निकला और सोए हुए शेर के पास इधर-उधर दौड़ने लगा। इससे शेर की नींद टूट गयी । उसने चूहे को पंजे मे धर दबोचा। बेचारा चूहा भय से काँपने लगा। चीं-चीं करते हुए उसने शेर से कहा, “हे जंगल के राजा, कृपया मुझे माफ कर दीजिए। मुझ पर दया कीजिए। मुझे छोड़ दीजिये। इस अहसान का बदला एक दिन मैं जरूर चुका दूगाँ। “

नन्हे चूहे के ये शब्द सुनकर शेर जोर से हँस पड़ा। उसने कहा, “बड़ी मजेदार सूझबूझ है तुम्हारी, नन्हे ! इत्ता-सा तो है तू! मुझ जैसे ताकतवर जंगल के राजा की तू क्या मदद करेगा? फिर भी शेर ‘तू को चूहे पर दया आ गयी। उसने चूहे को छोड़ दिया।

कुछ दिन बीत गये। एक दिन चूहे ने शेर की दर्द भरी दहाड़ सुनी। वह फौरन बिल से बाहर निकला। उसने देखा कि शेर सचमुच संकट में फँस गया है। शेर एक शिकारी के जाल मे फँस गया था। उसने जाल से निकलने की भरसक कोशिश की, पर उसे सफलता नही मिली। चूहा दौड़ता हुआ शेर के पास आया। उसने शेर से कहा, “जंगल के राजा, आप चिंता न करें। मै अभी आप को आजाद कर देता हूँ। चूहा अपने तेज दाँतो से जाल को कुतरने लगा। थोड़े समय में ही शेर जाल से मुक्त हो गया।

शेर ने चूहे को धन्यवाद दिया और की ओर चल दिया। अपनी गुफा

शिक्षा- छोटे जीवों की शक्ति को कम नही आँकना चाहिए।

बैल और मेंढक – Simple Short Motivation Stories in Hindi [20]

एक बार एक तालाब के किनारे छोटे-छोटे मेढक खेल रहे थे। तभी वहाँ एक बैल पानी पीने के लिए आया। उसने पानी पीकर जोर से डकारा। बैल के डकारने की अवाज सुनकर सभी मेढक भयभीत हो गये। वे सरपट भागते हुए अपनी दादी माँ के पास पहुँचे।

दादी माँ ने अपने पोते से पूछा, क्यों रे, क्या हुआ? तुम लोग घबराए हुए क्यों हो?

छोटे मेढक ने कहा, अरे दादी, अभी एक बहुत बड़ा जानवर तालाब में पानी पीने आया था। उसकी आवाज बहुत ही तेज और भंयकर थी।

दादी माँ ने पूछा, कितना बड़ा था वह जानवर? नन्हे मेढक ने जवाब दिया, अरे, बहुत ही बड़ा था वह। दादी माँ ने अपने चारो पैर फैलाकर और गाल फुलाकर कहा, वह इतना बड़ा था, क्या? छोटे मेढक ने कहा, अरे नही दादी वह इससे भी बहुत बड़ा था। दादी माँ दादी ने फिर गाल पेट फुलाकर कहा इससे बड़ा तो नही होगा। है न!

नन्हे मेढक नें जवाब दिया, नही दादी वह इससे भी बहुत बहुत बड़ा था। दादी माँ ने अपने शारीर को और फुलाया। इस प्रकार वह अपने शरीर को फुलाती गई। आखिरकार उसका पेट फट गया और वह मर गई।

शिक्षा – थोथा अभिमान विनाश का कारण होता है।

बंदर का इंसाफ – Good Short Moral Stories in Hindi [21]

दो बिल्लियाँ थीं। उन्हे एक दिन रास्ते पर एक केक दिखाई दिया। एक बिल्ली ने उछल कर फौरन उस केक को उठा लिया। दूसरी बिल्ली उससे केक छीनने लगी।

पहली बिल्ली ने कहा, चल हट ! यह केक मेरा है पहले मैंने ही इसे उठाया है।

दूसरी बिल्ली ने कहा, इसे पहले मैने देखा था, इसलिए यह मेरा हुआ।

उसी समय वहाँ से एक बंदर जा रहा था। दोनो बिल्लियो ने उससे प्रार्थना की, भाई तुम्ही निर्णायक बनो और हमारा झगड़ा निपटाओ। बंदर ने कहा, लाओ यह केक मुझे दो। मैं इसके दो बराबर बराबर हिस्से करूँगा और दोनों को एक-एक हिस्सा दे दूँगा ।

बंदर ने केक के दो टुकड़े किये। उसने दोनो टुकड़ो को बारी-बारी से देखा, फिर अपना सिर हिलाते हुए कहा, दोनो टुकड़े बराबर नही हैं। यह टुकड़ा दूसरे टुकड़े से बड़ा है। उसने बड़े टुकड़े से थोड़ा हिस्सा खा लिया। दोनो हिस्से बराबर नही हुए। बंदर ने फिर बड़े हिस्से में से थोड़ा खा लिया। बंदर बार बार बड़े टुकड़े में से थोड़ा-थोड़ा खाता रहा। अंत मे केक के केवल दो छोटे-छोटे टुकड़े बचे। बंदर नें बिल्लयो से कहा, ओ हो हो !

अब भला इतने छोटे-छोटे टुकड़े मैं तुम्हे कैसे दे सकता हूँ? चलो मैं ही खा लेता हूँ। यह कहकर बंदर केक के दोनो टुकड़े मुँह में डालकर चलता बना।

शिक्षा – दो की लड़ाई मे तीसरे का फायदा।

लोमड़ी और सारस – Motivational Short Moral Stories in Hindi [22]

एक सारस की एक लोमड़ी से मित्रता हो गई। एक बार लोमड़ी ने सारस को भोजन का निमंत्रण दिया। उसने सूप (रसा) तैयार किया और उसे दो सपाट तश्तरियों में परोस दिया।

चलो, खाने की शुरूआत करें। लोमड़ी ने सारस से कहा और सूप चाटना शुरू कर दिया। बड़ा मजेदार है। है न! सूप चाटते-चाटते वह बोली सारस ने सूप की सुगंध ली। उसके मुँह में पानी आ गया। पर सूप की एक बूंद भी उसके मुँह तक नहीं पहुँची उसकी चोंच लंबी थी और तश्तरी सपाट थी। उसे पता चल गया कि धूर्त लोमड़ी उसके मजाक कर रही है। लेकिन सारस चुप रहा। वह देखता रहा लोमड़ी सूप चट कर गई।

कुछ दिनों के बाद सारस ने लोमड़ी को भोजन का निमंत्रण दिया । वह लोमड़ी को अपने यहाँ ले गया। उसने भी स्वादिष्ट सूप बनाया। सँकरे मुँहवाली दो सुराहियों में सूप परोसकर सारस ने कहा चलो, शुरू करें खाना। उसने अपनी लंबी चोच सुराही में डाल दी। सारस आराम से सूप पी रहा था। सूप पीते-पीते उसने लोमड़ी से कहा, मैंने इतना स्वादिष्ट सूप कभी नही चखा था। इसे मैंने विशेष रूप से तुम्हारे लिए बनाया है। शर्म मत करो, जी भर कर खाओ।

पर लोमड़ी सूप का जरा भी स्वाद नहीं ले पाई । सुराही का गला बहुत तंग था। सूप तक उसका मुँह पहुँच ही नहीं पाया। उसे बडा दुःख हुआ। लोमड़ी समझ गई की उसने सारस के साथ जो शरारत की थी, उसी का यह फल उसे भुगतना पड़ रहा है।

शिक्षा – जैसे को तैसा

दो घड़े – Short Moral Stories in Hindi [23]

एक बार एक नदी में जोरो की बाढ़ आई। तीन दिनों के बाद बाढ़ का जोर कुछ कम हुआ। बाढ़ के पानी में ढेरों चीजें बह रही थीं। उनमें एक ताँबे का घड़ा एवं एक मिट्टी का घड़ा भी था। ये दोनों घड़े अगल-बगल तैर रहे थे।

ताँबे के घड़े ने मिट्टी के घड़े से कहा, अरे भाई, तुम नरम मिट्टी के बने हुए हो और बहुत नाजुक हो अगर तुम चाहो, तो मेरे समीप आ जाओ। मेरे पास रहने से तुम सुरक्षित रहोगे।

मेरा इतना ख्याल रखने के लिए अपको धन्यवाद, मिट्टी का घड़ा बोला, मैं आपके करीब आने की हिम्मत नहीं कर सकता। आप बहुत मजबूत और बलिष्ठ हैं। मैं ठहरा कमजोर और नाजुक कहीं हम आपस में टकरा गए, तो मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। यदि आप सचमुच मेरे हितैषी हैं, तो कृपया मुझसे थोड़ा दूर ही रहिए इतना कहकर मिट्टी का घड़ा तैरता हुआ ताँबे के घड़े से दूर चला गया।

शिक्षा – ताकवर पड़ोसी से दूर रहने में ही भलाई है।

चतुर खरगोश – Short Stories in Hindi with Moral for Kids [24]

एक जंगल में शेर और अन्य प्राणियों के बीच समझौता हुआ था। शेर के भोजन के लिए रोज एक प्राणी को उसकी गुफा में जाना पड़ता था। एक दिन एक खरगोश की बारी आई। उसे शेर के भोजन के समय तक उसकी गुफा में पहुँचना था। खरगोश बहुत चतुर था। उसने दुष्ट शेर को खत्म करने की योजना बनाई।

खरगोश जानबूझकर बहुत देर से शेर के पास पहुँचा। अब तक शेर के भोजन का समय बीत चुका था। उसे बहुत जोर की भूख लगी थी। इसलिए खरगोश पर उसे बहुत गुस्सा आया। “तुमने आने में इतनी देर क्यो कर दी ?” शेर ने गरजते हुए पूछा।

“महराज, क्या करूँ?” खरगोश ने बहुत ही नम्रतापूर्वक जवाब दिया,

“रास्ते में एक दूसरा शेर मिल गया था। वह मेरा पीछा करने लगा। बहुत मुश्किल से मैं उससे पिड छुड़ाकर यहाँ आ पाया हूँ।”

“दूसरा शेर? और वह भी इस जंगल में?” शेर ने गरजते हुए पूछा।

“हाँ महाराज, दूसरा शेर ! वह कहाँ रहता है, यह मुझे मालूम है। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको अभी दिखता हूँ।” खरगोश ने कहा। शेर खरगोश के साथ तुरंत ही चल पड़ा। खरगोश उसे एक कुएँ के पास ले गया और बोला, “महराज, यहाँ रहता है वह आइए, अंदर देखिए।” शेर ने कुँए में झाँककर देखा ।

पानी में उसे अपनी ही परछाईं दिखाई दी। उसने उस परछाईं को ही दूसरा शेर समझ लिया और गुस्से में आकर जोर से गर्जना की। उसने देखा कि कुँए का शेर भी उसकी ओर देखकर दहाड़ रहा है। तब शेर अपने गुस्से पर काबू न रख सका। उसने कुएँ में छलाँग लगा दी और पानी में डूबकर मर गया। इस तरह शेर का अंत हो गया।

शिक्षा – बुद्धि ताकत से बड़ी होती है।

गधे का दिमाग – Short Stories in Hindi Moral [25]

एक था शेर। वह जंगल का राजा था। एक सियार उसका मंत्री था। शेर रोज अपने भोजन के लिये एक जानवर का शिकार करता था। इस शिकार मे से एक हिस्सा सियार को मिलता था। मंत्री के रूप में सेवा करने का यह उसका मेहनताना था।

एक दिन शेर बीमार हो गया। वह शिकार करने के लिए गुफा से बाहर नहीं जा सका। उसने सियार से कहा, “आज मैं शिकार के लिये बाहर नही जा सकता। पर मुझे बहुत जोर की भूख लगी है। तुम जाओ किसी प्राणी को ले आओ ताकि उसे खाकर मै अपनी भूख मिटा सकूँ ।” सियार ने मन में विचार किया, “कोई जानवर अपनी खुशी से शेर की गुफा मे नही आयेगा! तो अब मै क्या करूँ !” बहुत विचार करने पर उसे एक तरकीब सूझी। उसने सोचा “गधा सबसे बेवकूफ प्राणी है। मै उसे झाँसा देकर यहाॅ ला सकता हूँ।

सियार गधे के पास गया। और बोला, “गधे भाई में तुम्हारे लिए एक खुशखबरी लाया हूँ। जंगल के राजा ने तुम्हे अपना मंत्री बनाने का निश्चय किया है। तुम अभी मेरे साथ चलकर उनसे भेंट कर लो।” यह सुनकर गधे को बहुत खुशी हुई। 

वह सियार के साथ शेर की गुफा मे गया उसको देखते ही भूखा शेर उस पर टूट पड़ा और उसे मार डाला। फिर उसने सियार से कहा, “मैं नदी में स्नान करके आता हूँ। तब तक तुम इस शिकार का ख्याल रखना।” शेर नदी की ओर चला गया। सियार भी बहुत भूखा था। शेर के वापस आने से पहले वह गधे के दिमाग को चट कर गया। जब शेर वापस लौटा उसने गधे की ओर देखा कहा “इस प्राणी का दिमाग कहाँ है ?”

सियार ने मुस्कराते हुए कहा, “महाराज अगर गधे को दिमाग होता तो क्या वह यहाँ आता। गधे को तो दिमाग होता ही नही । “

शिक्षा – धूर्त अपनी चालाकी से नही चूकता

घोड़े को सबक – Short Moral Stories in Hindi For Class 10 [26]

एक आदमी के पास एक घोड़ा और एक गधा था। एक दिन वह इन दोनों को लेकर बाजार जा रहा था। उसने गधे की पीठ पर खूब सामान लादा था। घोड़े की पीठ पर कोई सामान नहीं था।

रास्ते में गधे ने घोड़े से कहा, भाई मेरी पीठ पर बहुत ज्यादा वजन है। थोड़ा बोझ तुम भी अपनी पीठ पर ले लो ।

घोड़े ने कहा, बोझ ज्यादा हो या कम, मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं है। यह बोझ तुम्हारा है और इसे तुम्हें ही उठाकर चलना है। मुझसे इसके बारे में कुछ मत कहो ।

यह सुनकर गधा चुप हो गया। फिर वे तीनों चुपचाप चलने लगे। थोड़ी देर बाद भारी बोझ के कारण गधे के पाँव लड़खड़ाने लगे और वह रास्ते पर गिर पड़ा। उसके मुँह से झाग निकलने लगा।

इसके बाद उस आदमी ने गधे की पीठ से सारा सामान उतार दिया। उसने यह सारा बोझ घोड़े की पीठ पर लाद दिया।

चलते-चलते घोड़ा सोचने लगा, मैंने गधे का कुछ भार अपनी पीठ पर ले लिया यदि होता, तो कितना अच्छा होता। अब मुझे सारा बोझ उठाकर बाजार तक ले जाना पड़ेगा।

शिक्षा – दूसरों के दुःख-दर्द में हाथ बँटाने से हमारा दुःख-दर्द भी कम हो जाता है।

उम्मीद करता हूँ की आपको यह पोस्ट Short Stories in Hindi पसंद आया होगा अगर आपको इसके बारे में समझने में कोई दिक्कत हो या कोई सवाल है तो कमेंट बॉक्स में पूछ सकते है हम आपके प्रश्न का उत्तर जरूर देंगे।

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