भगवत गीता के प्रसिद्ध श्लोक भावार्थ सहित | Bhagavad Geeta Shlok in Sanskrit

आज इस अध्याय में भगवत गीता के प्रसिद्ध श्लोक भावार्थ सहित – Geeta Shlok in Sanskrit भारत का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ महाभारत है जिसके रचयिता वेदव्यास थे, महाभारत में पांडवों और कौरवों से युद्ध के दौरान भगवान श्रीं कृष्ण ने अर्जुन को भगवत गीता उपदेश दिये थे

जिसमे कई सारे प्रसिद्ध श्लोक सामिल है आज इस पोस्ट में श्रीं भगवत गीता के श्लोक अर्थ सहित इस पोस्ट में साझा करते है।

Bhagavad Geeta Shlok in Sanskrit in Hindi

(1)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

अर्थ : श्री कृष्ण कहते हैं की जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अपने स्वरूप की रचना करता हूँ।

(2)

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

अर्थ : साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों का विनाश करने के लिए, धर्म की स्थापना के लिए मैं युग युग में मानव के रूप में अवतार लेता हूँ|

(3)

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। 

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥

अर्थ : जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।

(4)

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌। 

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

अर्थ : निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है ।

Bhagavad Geeta Shlok in Sanskrit in Hindi

(5)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। 

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अर्थ : :श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।

(6)

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। 

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌॥

अर्थ : हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं ।

(7)

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌। 

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

अर्थ : जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है।

(8)

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌। 

असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

अर्थ : जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ।

(9)

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। 

न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

अर्थ : मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम ‘निष्कर्मता’ है । को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है ।

(10)

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। 

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥

अर्थ : जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।

(11)

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। 

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ 

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌। 

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

अर्थ : सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ।

(12)

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। 

सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥ 

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। 

भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा ॥

अर्थ : निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।

(13)

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पंडिता: समदर्शिन:॥

अर्थ : ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखने वाले होते हैं।

(14)

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। 

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञित ॥

अर्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है।

(15)

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। 

सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ॥

अर्थ : जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है।

(16)

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। 

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥

अर्थ : जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

(17)

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। 

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

अर्थ : परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।

(18)

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। 

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

अर्थ : प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करेै।

(19)

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌। 

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

अर्थ : जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

(20)

नाश्चर्यमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी। 

निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति॥

अर्थ : अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है। वह अपार शांति को प्राप्त करता है।

(21)

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी। 

कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥

अर्थ : न मैं यह शरीर हूँ और न यह शरीर मेरा है, मैं ज्ञानस्वरुप हूँ, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है। वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है।

(22)

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। 

द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥

अर्थ : हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

(23)

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी। 

तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥

अर्थ : चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है।

(24)

आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी। 

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥

अर्थ : संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक।

(25)

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। 

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥

अर्थ : जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।

Bhagavad Geeta Shlok in Sanskrit in Hindi

(26)

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌।

 तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥

अर्थ : जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।

(27)

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌।

 रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌॥

अर्थ : श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है।

(28)

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। 

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते॥

अर्थ : जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता हैूँ।

(29)

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते। 

एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥

अर्थ : ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।

(30)

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। 

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥

अर्थ : परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है।

(31)

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। 

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥

अर्थ : सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।

Bhagavad Geeta Shlok in Sanskrit in Hindi

(32)

तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। 

गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥

अर्थ : जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं।

(33)

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌। 

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

अर्थ : जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है।

(34)

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। 

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

अर्थ : जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

(35)

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। 

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥

अर्थ : हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।

(36)

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌। 

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥

अर्थ : हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?

(37)

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। 

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥

अर्थ : मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।

Bhagavad Geeta Shlok in Sanskrit in Hindi

(38)

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। 

इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥

अर्थ : मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ।

(39)

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌। 

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌।।

अर्थ : मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ ।

(40)

अर्थ : मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ।

(41)

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌। 

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥

अर्थ : मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ।

(42)

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥

अर्थ : सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ।

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