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अपठित गद्यांश पश्न-उत्तर सहित | Apathit Gadyansh For All Classes in Hindi

Apathit Gadyansh in Hindi : यहाँ आज इस लेख में 15+ अपठित गद्यांश पश्न-उत्तर सहित उपलब्ध कराएँगे जो छात्र हिंदी विषय से रूचि रखते है उन्हें अक्सर Apathit Gadyansh लिखने को मिलता है परीक्षा में कभी-कभी ऐसे गद्यांश दिए जाते हैं जिनका पाठ्यपुस्तकों से कोई संबंध नहीं रहता।

फिर भी उस अंश से संबद्ध कई प्रकार के प्रश्न रहते हैं छात्रों को उनका उत्तर देना पड़ता है इस अभ्यास से बौद्धिक क्षमता और भाषा पर उनकी कैसी पकड़ है, इसका ज्ञान होता है इस पोस्ट में आपको Apathit Gadyansh For All Classes in Hindi के कुछ नमूने उपलब्ध कराये है जो आपको काफी पसंद आएगा।

Apathit Gadyansh

छात्रों के लिए अपठित गद्यांश (1)

विश्वविद्यालय कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो समाज से काटकर अलग की जा सके। समाज दरिद्र है तो विश्वविद्यालय भी दरिद्र होंगे, समाज कदाचारी है, तो विश्वविद्यालय भी कदाचारी होंगे और समाज में अगर लोग आगे बढ़ने के लिए गलत रास्ते अपनाते हैं तो विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र भी सही रास्तों को छोड़कर गलत रास्तों पर अवश्य चलेंगे।

विश्वविद्यालयों और कॉलेजो में भी अशांति फैली है, जो भ्रष्टाचार फैला है, वह सब का सब समाज में फैलकर यहाँ तक पहुँचा है। समाज में जब सही रास्तों का आदर था, ऊँचे मूल्यों की कद्र थी, तब कॉलेजों में भी शिक्षक और छात्र गलत रास्तो पर कदम रखने से घबराते थे।

लेकिन अब समाज ने विशेषतः राजनीति ने, ऊँचे मूल्यों की अवहेलना कर दी और अधिकतर लोगों के लिए गलत रास्ते ही सही बन गए तो फिर उसका प्रभाव कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर भी पड़ना अनिवार्य हो गया। छात्रों की अनुशासनहीनता की जाँच करनेवाले लोग परिश्रम तो खूब करते हैं, किंतु असली बात बोलने से घबराते हैं।

सोचने की बात यह है कि पहले के छात्र सुसंयत क्यों थे? अब ये उच्छृंखल क्यों हो रहे हैं ? किसने किसको खराब किया है? चाँद ने सितारों को बिगाड़ा है या सितारों ने मिलकर चाँद को खराब कर दिया ?

प्रश्न 1: समाज से काटकर किसको अलग नहीं किया जा सकता ? 

उत्तर : विश्वविद्यालय को समाज से काटकर अलग नहीं किया जा सकता।

प्रश्न : विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र कब गलत रास्तों पर चलेंगे ?

उत्तर : जब समाज के लोग गलत रास्ते अपनाएँगे तब विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र भी गलत रास्ते पर चलेंगे।

प्रश्न : कौन असली बात बोलने से घबराते है ? 

उत्तर : छात्रों की अनुशासनहीनता की जाँच करनेवाले असली बात बोलने से घबराते हैं।

प्रश्न : ऊँचे मूल्यों की अवहेलना का नतीजा क्या हुआ ?

उत्तर : ऊँचे मूल्यों की अवहेलना का नतीजा यह हुआ कि अधिकतर लोगों के लिए गलत रास्ते ही सही बन गए।

प्रश्न : उपर्युक्त गद्यांश का एक समुचित शीर्षक दें। 

उत्तर : शीर्षक समाज और विश्वविद्यालय।

अपठित गद्यांश (2)

मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं। उत्सवी का एकमात्र उद्देश्य आनंद-प्राप्ति है। यह तो सभी जानते हैं कि मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आजीवन प्रयत्न करता रहता है। आवश्यकता की पूर्ति होने पर सभी को सुख होता है। पर, उस सुख और उत्सव के आनंद में बड़ा फर्क है। आवश्यकता अभाव सूचित करती है। उससे यह प्रकट होता है कि हममें किस बात की कमी है।

मनुष्य जीवन ही ऐसा है कि वह किसी भी अवस्था में यह अनुभव नहीं कर सकता कि अब उसके लिए कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। एक के बाद दूसरी वस्तु की चिंता उसे सताती ही रहती है। इसलिए किसी एक आवश्यकता की पूर्ति से उसे जो सुख होता है, वह अत्यंत क्षणिक होता है, क्योंकि तुरत ही दूसरी आवश्यकता उपस्थित हो जाती है। उत्सव में हम किसी बात की आवश्यकता का अनुभव नहीं करते। यही नहीं, उस दिन हम अपने काम काज छोड़कर विशुद्ध आनंद की प्राप्ति करते हैं। यह आनंद जीवन का आनंद है, काम का नहीं।

प्रश्न: मनुष्य किसलिए आजीवन प्रयत्न करता रहता है? 

उत्तर : मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आजीवन प्रयत्न करता रहता है।

प्रश्न : उत्सवों का एकमात्र उद्देश्य क्या है ?

उत्तर: उत्सवी का एकमात्र उद्देश्य आनंद की प्राप्ति है।

प्रश्न: मनुष्य को एक के बाद दूसरी चिता क्यों सताती रहती है ? 

उत्तर : मनुष्य की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती। अतः उसे एक के बाद दूसरी वस्तु की चिंता सताती रहती है।

प्रश्न: आवश्यकता पूर्ति का सुख क्षणिक क्यों होता है ?

उत्तर : आवश्यकता पूर्ति का सुख क्षणिक इसलिए होता है क्योंकि एक के बाद तुरत दूसरी आवश्यकता उपस्थित हो जाती है।

अपठित गद्यांश (3)

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की उत्कट अभिलाषा थी कि सिन्हा लाइब्रेरी के प्रबंध की उपयुक्त व्यवस्था हो जाए। ट्रस्ट पहले से मौजूद था लेकिन आवश्यकता यह थी कि सरकारी उत्तरदायित्व भी स्थिर हो जाए। ऐसा मसविदा तैयार करना कि जिसमें ट्रस्ट का अस्तित्व भी न टूटे और सरकार द्वारा संस्था की देखभाल और पोषण की भी गारंटी मिल जाए. जरा देवी खीर थी। एक दिन एक चाय पार्टी के दौरान सिन्हा साहब मेरे (जगदीशचंद्र माथुर) पास चुपके से आकर बैठ गए।

सन् 1949 की है। मैं नया-नया शिक्षा सचिव हुआ था, लेकिन सिन्हा साहब की मौजूदगी में मेरी क्या ? इसलिए जब मेरे पास बैठे और जरा विनीत स्वर में उन्होंने सिन्हा लाइब्रेरी की दास्तान शुरू की तो गया। न मे सोचने लगा कि जो सिन्हा साहब मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और गवर्नर से आदेश के स्वर में सिन्हा लाइवेरी जैसी उपयोगी संस्था के बारे में बातचीत कर सकते हैं, वे मुझे जैसे कल के छिकरे को क्यो सर चढ़ा रहे है। उस वक्त तो नहीं, किंतु बाद में गौर करने पर दो बातें स्पस्ट हुई।

एक तो यह कि मैं भले ही समझता रहा हूँ कि मेरी लल्लो-चप्पो हो रही है, किंतु वस्तुतः उनका विनीत स्वर उनके व्यक्ति के स साधारणतया अलक्षित और आई पहलू की आवाज थी, जो पुस्त तथा सिन्हा लाइब्रेरी के प्रति उनकी भावुकता के उमड़ने पर ही मुखरित होती थी।

प्रश्न : सिन्हा साहब लाइब्रेरी के लिए कैसा मसविदा तैयार करना चाहते थे ?

उत्तर : सिन्हा साहब लाइब्रेरी के लिए ऐसा मसविदा तैयार करना चाहते थे जिसमें ट्रस्ट का अस्तित्व भी न टूटे और सरकार द्वारा संख्या की देखभाल और पोषण की भी गारंटी मिल जाए।

प्रश्न : माथुर साहब क्यों सकपका गए ?

उत्तर : माथुर साहब इसलिए सकपका गए क्योंकि सिन्हा साहब-जैसा दबंग व्यक्ति उनके पास बैठकर विनीत स्वर में सिन्हा लाइब्रेरी की दास्तान सुनाने लगे।

प्रश्न : सिन्हा साहब किनके साथ और किसलिए आदेशात्मक स्वर में बात कर सकते थे ?

उत्तर : सिन्हा साहब का व्यक्तित्व ही ऐसा प्रभावशाली था कि वे मुख्यमंत्री शिक्षा मंत्री तथा गवर्नर तक से सिन्हा लाइब्रेरी जैसी उपयोगी संस्था के बारे में आदेशात्मक स्वर में बात कर सकते थे।

प्रश्न : माथुर साहब जिसे लल्लो-चप्पो समझते थे वह वास्तव में क्या था ?

उत्तर : माथुर साहब जिसे लल्लो-चप्पो समझते थे, वह वास्तव में सिन्हा साहब का विनीत स्वर उनके व्यक्तित्व के साधारणतया अलक्षित और आई पहलू की आवाज थी।

प्रश्न: कब और कौन नए-नए शिक्षा सचिव हुए थे ? 

उत्तर : सन् 1949 में जगदीशचन्द्र माथुर नए-नए शिक्षा सचिव हुए थे।

प्रश्न : सिन्हा साहब की कब और क्या उत्कट अभिलाषा थी?

उत्तर : अपने जीवन के अंतिम वर्षो में सिन्हा साहब की उत्कट अभिलाषा थी कि सिन्हा लाइब्रेरी के प्रबंध की उपयुक्त व्यवस्था की जाए।

अपठित गद्यांश (4)

अब्दुर्ररहीम खानखाना का जन्म 1553 ई. में हुआ था। इनकी मृत्यु सन् 1625 ई. में हुई। ये अरबी, फारसी और संस्कृत के विद्वान् थे ही, हिंदी के विख्यात कवि भी थे। ये सम्राट् अकबर के दरबार के नवरत्नों में एक थे। उनमें हिंदी के एक अन्य प्रसिद्ध कवि गंग भी थे। रहीम कवि अकबर के प्रधान सेनापति और मंत्री थे। इन्होंने अनेक युद्धों में भाग लिया था।

युद्ध में सफलता प्राप्ति के कारण अकबर ने इन्हें जागीर में बड़े-बड़े सूबे दिए थे। रहीम बड़े परोपकारी और दानी भी थे। इनके हृदय में दूसरे कवि के लिए बड़े सम्मान का भाव रहता था। गंग कवि के एक छप्पय पर रहीम ने उन्हें छत्तीस लाख रुपए दे दिए थे। जब तक रहीम के पास संपत्ति थी, तब तक वह दिल खोलकर दान देते रहे। रहीम की काव्य उक्तियाँ बड़ी मार्मिक हैं क्योंकि वे हृदय से स्वाभाविक रूप से निःसृत हुई हैं।

प्रश्न : रहीम का जन्म और मृत्यु कब हुआ था ?

उत्तर : रहीम का जन्म 1553 ई. में हुआ तथा मृत्यु 1625 ई. में हुई । प्रश्न : रहीम किन विषयों के विद्वान् तथा किसके प्रसिद्ध कवि थे ? उत्तर : रहीम अरबी, फारसी और संस्कृत के विद्वान् तथा हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे।

प्रश्न : रहीम बड़े परोपकारी और दानी थे। कैसे ? 

उत्तर : रहीम बड़े परोपकारी और दानी थे। एक छप्पय पर उन्होंने गंग

कवि को छत्तीस लाख रुपए दे दिए थे। जब तक उनके पास संपत्ति थी, तब तक वह दिल खोलकर दान देते रहे।

प्रश्न : किनकी काव्य उक्तियाँ मार्मिक है और क्यों?

उत्तर : रहीम की काव्य उक्तियाँ इसलिए मार्मिक हैं क्योंकि वे उक्तियाँ स्वाभाविक रूप से निकली हैं।

अपठित गद्यांश (5)

साहित्य के विकास में प्रतिभाशाली मनुष्यों की तरह जन-समुदायों और जातियों की विशेष भूमिका होती है। इसे कौन नहीं जानता कि यूरोप के सांस्कृतिक विकास में जो भूमिका प्राचीन यूनानियों की है, वह अन्य किसी जाति की नहीं। जन समुदाय जब एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश करता है, तब उसकी अस्मिता नष्ट नहीं हो जाती। प्राचीन यूनान अनेक गण-समाजों में बँटा हुआ था। आधुनिक यूनान एक राष्ट्र है।

यह आधुनिक यूनान अपनी प्राचीन संस्कृति से अपनी एकात्मकता स्वीकार करता है या नहीं ? 19वीं सदी में शैले और बायरन ने अपनी स्वाधीनता के लिए लड़नेवाले यूनानियों को ऐसी एकात्मकता पहचनवाने में बड़ा परिश्रम किया। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान इस देश ने इसी तरह अपनी एकात्मकता पहचानी इतिहास का प्रवाह ही ऐसा है कि विच्छिन्न है और अविच्छिन्न थी। मानव समाज बदलता है और अपनी पुरानी अस्मिता कायम रखता है।

जो तत्त्व मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करते हैं, उनमें इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर निर्मित यह अस्मिता का ज्ञान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बंगाल विभाजित हुआ और है, किंतु जब तक पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोगों को अपनी साहित्यिक परंपरा का ज्ञान रहेगा तब तक बंगाली जाति सांस्कृतिक रूप से अविभाजित रहेगी। विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, जो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहाँ ज्यादा है और कहाँ कम और इस न्यूनतम ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते है।

प्रश्न : यूरोप के सांस्कृतिक विकास में किसको भूमिका प्रधान रही है ? 

उत्तर : यूरोप के सांस्कृतिक विकास में प्राचीन यूनानियों की विशेष भूमिका रही है।

प्रश्न : प्राचीन यूनान कितने गण समाजों में बँटा हुआ था ?

उत्तर : प्राचीन यूनान अनेक गण-समाजों में बँटा हुआ था।

प्रश्न : यूनान ने अपनी एकात्मकता कब और किस तरह पहचानी ? 

उत्तर : जब यूनान अनेक गण समाजो में बँटा हुआ था तब उसकी अस्मिता नष्ट होने लगी। अपनी अस्मिता को नष्ट होते देखकर यूनानियों ने अपनी एकात्मकता के स्वरूप को पहचाना।

प्रश्न : कौन-सा तत्त्व मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करता है ? 

उत्तर : इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर निर्मित अस्मिता मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करती है।

अपठित गद्यांश (6)

अनंत रूपों में प्रकृति हमारे सामने आती है— कहीं मधुर, सुसज्जित या सुंदर रूप में, कहीं रूखे, बैडौल या कर्कश रूप में, कहीं भव्य, विशाल या विचित्र रूप में और कहीं उम्र, कराल या भयंकर रूप में। सच्चे कवि का हृदय उसके उन सब रूपों में लीन होते हैं, क्योंकि उसके अनुराग का कारण अपना खास सुख भोग नहीं, बल्कि चिर साहचर्य द्वारा प्रतिष्ठित वासना है।

जो केवल प्रफुल्ल प्रसून प्रसाद के सौरभ संचार, मकरंद लोलुप मधुकर के गुंजार, कोकिल-कूजित निकुंज और शीतल सुख-स्पर्श समीर की ही चर्चा किया करते हैं, वे विषयी या भोगी हैं। इसी प्रकार जो केवल अत्यंत विशाल गिरि-शिखर से गिरते जलप्रपात की गंभीर गति से उठी हुई सीकर निहारिका के बीच विविध वर्ण स्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं, वे तमाशबीन है, सच्चे भावुक या सहृदय नहीं। प्रकृति के साधारण, असाधारण सब प्रकार के रूपों को रखनेवाले वर्णन हमें कालिदास, भवभूति आदि संस्कृत के प्राचीन कवियों में मिलते है।

प्रश्न: सच्चे कवि का हृदय प्रकृति के किन-किन रूपों में लीन होता है ? 

उत्तर : सध्ये कवि का हृदय प्रकृति के अनंत रूपों में लीन रहता है, क्योंकि उसके अनुराग का कारण अपना खास सुख भोग नहीं बल्कि चिर साहचर्य द्वारा प्रतिष्ठित वासना होती है। 

प्रश्न : विषयी या भोगी कौन है ?

उत्तर : वैसे कवि जो प्रफुल्ल प्रसून प्रसाद के सौरभ-संचार, मकरंद, लोलुप मधुकर के गुंजार आदि की चर्चा करते हैं वे विषयी या भोगी होते है।

प्रश्न : तमाशबीन कौन है ?

उत्तर : वैसे कवि जो जलप्रपात की गंभीर गति से उठी हुई निहारिका के बीच विविध वर्ण स्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता का समागत करते हैं वे तमाशबीन है।

प्रश्न : भवभूति किस भाषा के कवि है ?

उत्तर : भवभूति संस्कृत भाषा के कवि हैं।

अपठित गद्यांश (7)

साहित्योन्नति के साधनों में पुस्तकालयों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इनके द्वारा साहित्य के जीवन की रक्षा, पुष्टि और अभिवृद्धि होती है। पुस्तकालय सभ्यता के इतिहास का जीता जागता गवाह है। इसी के बल पर वर्तमान भारत को अपने अतीत के गौरव पर गर्व है। पुस्तकालय भारत के लिए कोई नई वस्तु नहीं है। लिपि के आविष्कार से आज तक लोग निरंतर पुस्तकों का संग्रह करते रहे हैं। पहले देवालय, विद्यालय और नृपालय, इन संग्रहों के प्रमुख स्थान होते थे।

इनके अतिरिक्त विद्वज्जनों के अपने निजी पुस्तकालय भी होते थे मुद्रणकला के आविष्कार से पूर्व पुस्तकों का संग्रह करना आजकल की तरह सरल बात न थी। आजकल साधारण स्थिति के पुस्तकालय में जितनी संपत्ति लगती है, उतनी उन दिनो कभी-कभी एक पुस्तक की तैयारी में लग जाया करती थी। भारत के पुस्तकालय संसार भर में अपना सानी नहीं रखते थे। प्राचीन काल से मुगल सम्राटों के समय तक यही स्थिति रही। चीन, फ्रांस, प्रभूति सुदूर स्थित देशों से झुंड के झुंड विद्यानुरागी लंबी यात्राएँ करके भारत आया करते थे।

प्रश्न : प्रस्तुत गद्यांश का उचित शीर्षक क्या हो सकता है?

उत्तर : शीर्षक पुस्तकालय का महत्त्व प्रश्न : पुराने समय में अधिक व्यय क्यों होता था ?

उत्तर : पुराने समय में पुस्तकों पर अधिक व्यय इसलिए होता था. क्योंकि उस समय एक-एक पुस्तक की तैयारी में बहुत संपति लग जाती थी।

प्रश्न : पुस्तकालय का प्रारंभ कब से हुआ ?

उत्तर : पुस्तकालय का आरंभ सभ्यता के विकास के साथ-साथ हुआ।

प्रश्न : साहित्य की उन्नति का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण साधन क्या है?

उत्तर : साहित्य की उन्नति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है— निरंतर पुस्तकों का संग्रह करते रहना।

प्रश्न : पहले पुस्तकालय किन-किन स्थानों पर हुआ करते थे ? 

उत्तर : पहले पुस्तकालय देवालय, विद्यालय और नृपालयों में हुआ करते थे।

प्रश्न : पुस्तकालयों के कारण भारत को क्या गौरव प्राप्त था ?

उत्तर : पुस्तकालय के द्वारा साहित्य के जीवन की रक्षा और वृद्धि होती है। यह सभ्यता के इतिहास का जीता जागता गवाह है। इसलिए भारत को इसका गौरव प्राप्त था।

अपठित गद्यांश (8)

हमारी हिंदी सजीव भाषा है। इसी कारण इसने अरबी, फारसी आदि के संपर्क में आकर इनके तो शब्द संग्रह किए ही है, अब अँगरेजी के भी शब्द ग्रहण करती जा रही है। इसे दोष नहीं, गुण ही समझना चाहिए, क्योंकि अपनी इस ग्रहणशक्ति से हिंदी अपनी वृद्धि कर रही है ह्रास नहीं। ज्यों-ज्यों इसका प्रचार बढ़ेगा, त्यों-त्यों इसमें नए शब्दो का आगमन होता जाएगा।

क्या भाषा की विशुद्धता के किसी भी पक्षपाती में यह शक्ति है कि वह विभिन्न जातियों के पारंपरिक संबंध को न होने दे या भाषाओं की सम्मिश्रण-क्रिया में रुकावट पैदा कर दे ? यह कभी संभव नहीं। हमें तो केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस सम्मिश्रण के कारण हमारी भाषा अपने स्वरूप को तो नहीं नष्ट कर रही—कही अन्य भाषाओं के बेमेल शब्दों के मिश्रण से अपना रूप तो विकृत नहीं कर रही। अभिप्राय यह कि दूसरी भाषाओं के शब्द, मुहावरे आदि ग्रहण करने पर भी हिंदी, हिंदी ही बनी रही है या नहीं, बिगड़कर कही वह कुछ और तो नहीं होती जा रही है?

प्रश्न : प्रस्तुत गद्यांश का उचित शीर्षक दें।

उत्तर : शीर्षक हिंदी भाषा का महत्त्व ।

प्रश्न : सजीव भाषा से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर : सजीव भाषा से तात्पर्य है कि जिस भाषा ने अनेक भाषाओं के शब्दों को अपने में पचा लिया हो, जिस भाषा की शब्द-ग्रहण करने की शक्ति (प्रयोग शक्ति) जितनी ही सहज होगी, वह भाषा उतनी ही सजीव होगी, विकसित होगी।

प्रश्न : हिंदी में नए शब्दों का आगमन क्यों उचित है ?

उत्तर : हिंदी में नए शब्दों के आगमन से शब्द भंडार समृद्ध होगा। अभिव्यक्ति में, समझदारी में, विकास में मदद मिलेगी। नए शब्दों के प्रयोग से हिंदी सुगम, सहज और सर्वग्राह्य बनेगी। 

प्रश्न : हिंदी में नए शब्दों को अपनाते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए ?

उत्तर : हिंदी में नए शब्दों को अपनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी की अपनी मौलिकता नष्ट नहीं हो। प्रयोग के समय हिंदी का मूल स्वरूप विकृत नहीं हो इसका ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न : भाषा की विशुद्धता क्या है ?

उत्तर : भाषा की विशुद्धता’ से तात्पर्य है— हिंदी की मौलिकता विनष्ट नही हो। उसकी अभिव्यक्ति की सार्थकता बनी रहे तथा व्यवहार में जटिलता और असहजता नहीं आए।

प्रश्न : हिंदी भाषा की किस विशेषता को दोष नहीं गुण माना गया है ?

उत्तर : हिंदी अंतरराष्ट्रीय भाषा का स्थान ग्रहण कर रही है। अतः वह विश्व की अनेक भाषाओं के संपर्क में आ रही है जिस कारण अनेक नए-नए शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं। इससे हिंदी का विकास और विश्व स्तर पर प्रयोग भी होगा। अतः अरबी, फारसी, अँगरेजी आदि विदेशी भाषाओं के शब्द ग्रहण करने की विशेषता को हिंदी भाषा का दोष नहीं गुण समझना चाहिए।

अपठित गद्यांश (9)

“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवताः ” अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है, यानी वहाँ सुख-समृद्धि शांति होती है। यह बात प्राचीनकाल में मनुस्मृति में कही गई थी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उस वक्त नारी का सम्मान नहीं होता था और यह बात नारी के सम्मान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कही गई थी। बल्कि यह बात अनुभव से कही गई थी। प्राचीनकाल में हमारे देश में नारी, समाज की बहुत सम्माननीय सदस्या थी। गार्गी, मैत्रेयी, गौतमी, अपाला आदि प्राचीनकाल की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित नारियाँ है। प्राचीनकाल से ही नारियाँ हमारे देश में पुरुषों के बराबर बैठती रही हैं और समाज के निर्माण कार्यों में अपना योगदान देती रही हैं।

किंतु मध्यकाल तक आते-आते देश पर जल्दी जल्दी और कई आक्रमण हुए जिससे पूरी समाज व्यवस्था बिगड़ गई। ऐसे में नारी के प्रति लोगों की दृष्टि भी बदली तब नारी की सीमाएँ, धीरे-धीरे पर की चारदीवारी तक ही सिमटकर रह गई। आज हम जिस पुरुष प्रधान समाज की बात करते है, वह एक प्रकार के मध्यकाल की ही देन है। शायद यही कारण है कि मध्यकाल में मीरा के अलावा बहुत कम प्रतिष्ठित नारियों के नाम हमारे सामने आते है। प्राचीनकाल में यह स्थिति इतनी जटिल नहीं थी बल्कि उसकाल में तो मातृ सत्तात्मक समाज के भी प्रमाण मिलते हैं, यानी समाज में नारी को निर्णय लेने का पूरा अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न : उपर्युक्त गद्यांश का एक समुचित शीर्षक दें।

उत्तर : प्राचीनकाल का नारी समाज” अथवा “प्राचीनकाल की नारी” ।

प्रश्न : मनुस्मृति में क्या कहा गया है ?

उत्तर : मनुस्मृति में कहा गया है- “यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवताः” अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है। यानी वहाँ सुख-समृद्धि और शांति होती है। T

प्रश्न : प्राचीनकाल में नारियों को सम्माननीय स्थान प्राप्त था। कैसे ? 

उत्तर : प्राचीनकाल में नारियों को सम्माननीय स्थान प्राप्त था। नारी समाज की बहुत ही सम्माननीय सदस्या थी। गार्गी, मैत्रेयी, गौतमी, अपाला आदि प्राचीनकाल की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित नारियाँ हैं। प्राचीनकाल से ही नारियाँ हमारे देश में पुरुषों के बराबर बैठती रही हैं और समाज के निर्माण कार्यों में उनका विशिष्ट योगदान रहा है।

प्रश्न : मध्यकाल में नारियों को चारदीवारी में क्यों सिमटना पड़ा ? 

उत्तर : मध्यकाल में नारियों को चारदीवारी में इसलिए सिमटना पड़ा क्योकि उस समय हमारे देश पर कई आक्रमण हुए। फलस्वरूप समाज की पूरी व्यवस्था बिगड़ गई। इस कारण नारी के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदल गया। अतः नारी की सीमाएँ धीरे धीरे घर की चारदीवारी तक ही सिमटकर रह गई।

प्रश्न : आज का पुरुष प्रधान समाज कब की देन है ? 

उत्तर : आज का पुरुष प्रधान समाज एक प्रकार से मध्यकाल की ही देन है। मध्यकाल में मीरा के अलावा बहुत कम प्रतिष्ठित नारियों के नाम हमारे सामने आते है।

प्रश्न : मातृसत्तात्मक समाज कब था ? उसमें नारियों को क्या अधिकार प्राप्त था ?

उत्तर : प्राचीनकाल में मातृसत्तात्मक समाज था इसके भी अनेक प्रमाण मिलते हैं। इस संबंध में प्राप्त कुछ प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। समाज में नारियों को निर्णय लेने का पूरा अधिकार प्राप्त था।

अपठित गद्यांश (10)

बिहार राज्य में सौभाग्यशाली है छपरा जिला की जीरादेई की वह धरती जिसकी भूल में लोट-पोटकर बड़े हुए थे हमारी आँखों के तारे देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद। इनकी प्रारंभिक पढ़ाई उर्दू-फारसी के माध्यम से हुई। 1902 ई. में ये इंट्रेस परीक्षा में बैठे, तो कलकत्ता विश्वविद्यालय मे सर्वप्रथम आए। इसके बाद इन्होंने एफ. ए., बी. ए., एम.ए. तथा एम. एल. की उपाधियाँ प्राप्त की। स्कूली शिक्षा पटना के टी. के. घोष अकादमी में हुई। यदि किसी भारतीय नेता के विद्यार्थी जीवन में उसकी उत्तर पुस्तिकाओं का परीक्षण कर यह अभिशंसा की गई हो, “परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक योग्य है”, तो वे हैं विद्यार्थी राजेन्द्र प्रसाद ।

जब भारत में गणतंत्र का सूर्य चमका, तो सम्पूर्ण राष्ट्र ने इनकी त्याग तपस्या से वशीभूत होकर 1950 ई. में इन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति पद पर आसीन किया। तब से 14 मई 1962 तक ये भारत के गौरवगढ़ के सर्वमान्य अधिपति बने रहे। उन दिनों राष्ट्रपति का मासिक वेतन दस हजार रुपए थे, किंतु इन्होंने इसे घटाकर स्वेच्छा से ढाई हजार कर दिया था। एक निर्धन देश का राष्ट्रपति इतनी मोटी रकम ले—यह इन्हें स्वीकार नहीं था। त्याग से भी अहंकार उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है, किन्तु राजेन्द्र बाबू में ऐसा कभी नहीं हुआ। राष्ट्रपति होने के पश्चात् राजेन्द्र बाबू जनता के उतने ही निकट रहे जितने पहले थे। इन्होंने राष्ट्रपति भवन का द्वार सबके लिए उन्मुक्त कर दिया था। राष्ट्र के महानतम व्यक्ति से देश का लघुतम व्यक्ति समभाव से मिल सकता था तो यह इनके हृदय की विशालता थी।

प्रश्न : इस गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दें।

उत्तर : “त्याग और तपस्या के महान् साधक” डॉ. राजेन्द्र प्रसाद। अथवा, “महान् तपस्वी” राष्ट्रनायक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ।

प्रश्न : जीरादेई की धरती सौभाग्यशाली क्यों है ?

उत्तर : जीरादेई की धरती अत्यंत सौभाग्यशाली है, क्योंकि इस पावन भूमि पर युगद्रष्टा तथा हमारे परमप्रिय पथप्रदर्शक देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी बाल्यावस्था यहाँ की धूलि में लोट पोटकर व्यतीत किया।

प्रश्न : राजेन्द्र बाबू की स्कूली शिक्षा कहाँ हुई ?

उत्तर : • राजेन्द्र बाबू की स्कूली शिक्षा पटना के टी. के. घोष अकादमी में हुई।

प्रश्न : परीक्षार्थी राजेन्द्र की उत्तर-पुस्तिका पर क्या अभिशंसा की गई ? 

उत्तर : परीक्षा में परीक्षार्थी राजेन्द्र प्रसाद की उत्तर-पुस्तिकाओं मे अभिशंसा की गई थी. “परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक योग्य है।”

प्रश्न : राजेन्द्र बाबू को 1950 में राष्ट्रपति पद पर क्यों बिठाया गया ? 

उत्तर : राजेन्द्र बाबू के अपूर्व त्याग तथा राष्ट्र की महान सेवा से प्रभावित होकर 1950 में उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति पद पर आसीन किया गया।

प्रश्न : सिद्ध करें कि राजेन्द्र बाबू को त्याग से भी अहंकार उत्पन्न नहीं हुआ।

उत्तर : राष्ट्रपति होने के बाद भी राजेन्द्र बाबू को कभी अहंकार उत्पन्न नहीं हुआ। वे राष्ट्रपति होने के पश्चात् भी जनता के उतने ही निकट रहे जितना उसके पूर्व थे। उन्होंने राष्ट्रपति भवन का द्वार जनता-जनार्दन के लिए खोल दिया था। साधारण से साधारण व्यक्ति भी उनसे बेरोकटोक किसी भी समय मिल सकता था।

अपठित गद्यांश (11)

हमारी धरती ने बापू को जन्म दिया, किंतु इस धरती को यह सौभाग्य न हुआ कि जो महापुरुष देश की पराधीनता की बेड़ियाँ काटे और देश की प्रतिष्ठा को संसार मे ऊँचा ले जाए, उसका हम स्वागत कर सके। अपने द्वारा प्रतिष्ठापित स्वतंत्र राष्ट्र में जीवित रहकर विश्वशांति और विश्वबंधुत्व का अपना सपना उन्होंने पूरा किया। महात्मा जी को इससे अच्छी मृत्यु क्या मिल सकती थी कि मानवता की रक्षा करते हुए उन्होंने प्राण दिए ?

प्रश्न : महात्मा जी ने हमारे लिए क्या किया ?

उत्तर : महात्मा गाँधी ने हमारे लिए पराधीनता की बेड़ियाँ काटकर संसार में देश की प्रतिष्ठा को बढ़ाया।

प्रश्न : रेखांकित शब्दों के अर्थ लिखिए ।

उत्तर : प्रतिष्ठा—सम्मान, इज्जतः विश्वबंधुत्व — भाईचारा ।

प्रश्न : क्या महात्मा जी विश्वशांति और विश्वबंधुत्व का अपना सपना पूरा कर सके ?

उत्तर : महात्मा जी ने विश्वशांति और विश्वबंधुत्व के लिए अपने द्वारा प्रतिष्ठापित स्वतंत्र राष्ट्र में जीवित रहकर मानवता की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागकर अपना सपना पूरा किया।

प्रश्न : उचित शीर्षक दें।

उत्तर : शीर्षक महात्मा का सार्थक बलिदान ।

अपठित गद्यांश (12)

आज से सौ वर्ष पूर्व मोहनदास करमचंद गाँधी ने शिक्षा के परिवर्तन पर मंथन किया था। उन्होंने शिक्षा का विश्लेषण केवल विद्यालय पुस्तक तथा परीक्षा तक ही सीमित रखकर नहीं किया था अपितु उन्होंने भारत की स्थिति पर विचार करने, प्रगति, सभ्यता तथा स्वतंत्रता को परखने का माध्यम बनाया था। ऐसा नही है कि उनके प्रत्येक विचार से सभी सहमत हो, पर सभी इस बात पर सहमत हैं कि उनके विचारों में समता, ईमानदारी, प्रखरता तथा भविष्य निर्माण की दृष्टि थी।

प्रसिद्ध टिप्पणीकार जगमोहन सिंह राजपूत ने लिखा है कि “भारत ने अनेक शिक्षाविद तथा नीति निर्धारक जब गाँधी के ‘हिंद स्वराज’ में दिए गए विचारों तथा बाद में बुनियादी शिक्षा और नई तालीम पर उनके विचारों से मुँह चुराते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वे गाँधीजी के विचारों की गतिशीलता को या तो समझ नहीं पा रहे है या समझना नहीं चाहते।” हिंद स्वराज पुस्तक 1903 ई. में लिखी गई। महात्मा गाँधी पहली बार 1888 ई. में विदेश के लिए रवाना हुए थे।

वे 1888 से 1914 ई. के बीच भारत में केवल चार वर्ष ही रहे। गोपालकृष्ण गोखले ने गाँधीजी को सलाह दी थी कि उन्हें भारत भ्रमण कर देश की परिस्थितियों से परिचित होना चाहिए। इस सलाह के पूर्व ही गाँधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ नामक पुस्तक लिखी थी। नवंबर, 1905 में गाँधीजी ने शिक्षा पर एक लेख लिखा था। उस लेख में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों को सलाह दी थी कि उन्हें भारत में घटित हो रहे परिवर्तनों से सबक लेना चाहिए।

उस समय गाँधीजी अँगरेजी एवं गुजराती में ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक अखबार निकाल रहे थे। वे भारत की सारी घटनाओं से परिचित थे। शिक्षा संबंधी विचार उस समय उनके मानस में अंकुरित हो चुके थे। उस लेख में उन्होंने कहा था कि “भारतीयों का यह कर्तव्य बनता है कि वे शिक्षा प्रसार के लाभों से परिचित हो और यदि दक्षिण अफ्रीका की सरकार आगे नहीं आती है तो वे स्वयं आगे आकर भारतीय बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करें।”

प्रश्न : ‘हिंद स्वराज’ की रचना कब हुई एवं इस लेख में महात्मा गाँधी ने भारतीयों से क्या कहा था ?

उत्तर : ‘हिंद स्वराज’ पुस्तक की रचना 1903 ई. में हुई थी। इस लेख में महात्मा गाँधी ने भारतीयों से कहा था कि उनका (भारतीयों) यह कर्तव्य बनता है कि वे शिक्षा प्रसार के लाभों से परिचित हो ।

प्रश्न : महात्मा गाँधी को गोपालकृष्ण गोखले ने कैसी सलाह दी थी ?

उत्तर : गोपालकृष्ण गोखले ने गाँधीजी को भारत भ्रमण कर देश की परिस्थितियों को समझने को कहा था।

प्रश्न : भारत में अनेक शिक्षाविद् महात्मा गाँधी के शिक्षा संबंधी विचारों से क्यों सहमत नहीं है ? उत्तर : भारत के अनेक शिक्षाविद गाँधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों से

इसलिए सहमत नहीं है क्योंकि या तो वे अब तक इन्हें समझ नहीं पाए हैं या समझना नहीं चाहते।

प्रश्न : महात्मा गाँधी ने नवंबर, 1905 में अपने लेख में दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों से क्या कहा था ?

उत्तर : महात्मा गाँधी ने नवंबर, 1905 में अपने लेख में दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों को भारत की बदलती परिस्थितियों से सबक लेने को कहा था।

प्रश्न : शिक्षा के संबंध में महात्मा गाँधी की धारणा क्या थी ?

उत्तर : शिक्षा पढ़ने या पढ़ाने का नाम नही है। शिक्षा का मतलब है देश की स्थिति, परिस्थिति, प्रगति, सभ्यता एवं स्वतंत्रता को परखने की समझ शिक्षा के संबंध में महात्मा गाँधी की यही धारणा थी।

प्रश्न : महात्मा गाँधी पहली बार विदेश के लिए कब रवाना हुए थे ?

उत्तर : महात्मा गाँधी ने पहली बार 1888 ई. में विदेश गमन किया

था।

अपठित गद्यांश (13)

लोभी मनुष्य की मानसिक स्थिति विचित्र सी होती है। धन के प्रति उसकी ललक की तीव्रता और उत्कटता को देखकर ऐसा लगता है मानो वह सामान्य इनसान नहीं हो। सामान्य इनसान ललक की तीव्रता का शिकार होकर, तज्जन्य अशांति एवं अस्थिरता को स्वीकार कर ही नहीं सकता। धन इकट्ठा करना सभी चाहते हैं, लेकिन लोभी का धन इकट्ठा करना कुछ और ही है। वह बहुधा धन इसलिए इकट्ठा करता है जिसमे उसे किसी समय उसकी कमी न हो, परंतु उसे उसकी कमी हमेशा बनी ही रहती है।

पहले उसकी कमी कल्पित होती है, परंतु पीछे वह यथार्थ, असली हो जाती है, क्योंकि घर में धन रहने पर भी वह उसे काम में नहीं ला सकता। लोभ से असंतोष की वृद्धि होती है और संतोष का सुख खाक में मिल जाता है। लोभ से भूख बढ़ती है और तृप्ति घटती है। लोभ से मूलधन व्यर्थ बढ़ता है और उसका उपयोग कम होता है। लोभी का धन देखने के लिए, वृथा रक्षा करने के लिए और दूसरों को छोड़ जाने के लिए होता है। ऐसे धन से क्या लाभ? ऐसे धन को इकट्ठा करने में अनेक कष्ट उठाने की अपेक्षा संसार भर में जितना धन है उसे अपना ही समझना अच्छा है।

प्रश्न : लोभी का धन किसके काम आता है ?

उत्तर : लोभी का धन दूसरे के काम आता है।

प्रश्न : लोभ बुरा है, क्यों ?

उत्तर : लोभ से मूलधन है। व्यर्थ बढ़ता है और उसका उपयोग कम होता

प्रश्न : लोभी हमेशा धन के अभाव का अनुभव क्यों करता है?

उत्तर : असंतोष के कारण लोभी हमेशा अपने को धनहीन समझता है।

प्रश्न : लोभी मनुष्य सामान्य इनसान नहीं होता, क्यों ?

उत्तर : विचित्र मानसिक स्थिति के कारण लोभी सामान्य इनसान नही होता है क्योंकि सामान्य इनसान धन की ललक का शिकार होकर अशांति और अस्थिरता को स्वीकार कर ही नहीं सकता।

अपठित गद्यांश (14)

14. कहानी अपनी कथा-वृत्ति के कारण संसार की प्राचीनतम विधा है। गल्य हुए कथा, आख्यायिका, कहानी, इन अनेक नामों से आख्यात विख्यात कहानी का इतिहास विविध कोणीय है। युगांतर के साथ कहानी में परिवर्तन है और इसकी परिभाषाएँ भी बदली हैं। कहानी का रंगमंचीय संस्करण है एकांकी। इसी तरह उपन्यास का रंगमंचीय संस्करण है नाटक। लेकिन उपन्यास और कहानी अलग-अलग हैं। कहानी में एकान्वित प्रभाव होता है, उपन्यास में समेकित प्रभावन्विति होती है। कहानी को बुलबुला और उपन्यास को प्रवाह माना गया है।

कहानी टार्चलाइट है, किसी एक बिंदु या वस्तु को प्रकाशित करती है, उपन्यास दिन के प्रकाश की तरह शब्दों को समान रूप से प्रकाशित करता है। कहानी में एक ओर एक घटना ही होती है। उपन्यास में प्रमुख और गौण कथाएँ होती है। कहानी ध्रुपद की तान की तरह है, आरंभ होते ही समाप्ति का सम-विषम उपस्थित हो जाता है। उपन्यास शास्त्रीय संगीत का आलाप है। आलाप में आधी रात गुजर जाती है। कुछ लोग दर्शक दीर्घा में सो जाते हैं, कुछ घर लौट जाते हैं। पर कहानी शुरू हो गई तो पढ़नेवाले को खत्म तक पहुँचने को लाचार कर देती है चाहे परोसा गया खाना ठंडा हो या डाकिया दरवाजे पर खड़ा है। कहानी प्रमुख हो जाती है। उपन्यास पुस्तक से निकलकर पाठक के साथ शौचालय, शयनगृह, चौराहा-सड़क सर्वत्र चलने लगता है।

प्रश्न : उपर्युक्त गद्यांश का एक समुचित शीर्षक 

उत्तर : कहानी व उपन्यास । दें।

प्रश्न : ‘कहानी’ अन्य किन नामों से आख्यात विख्यात है ?

उत्तर : कहानी गल्प, कथा, आख्यायिका, इन अनेक नामों से आख्यात विख्यात है।

प्रश्न : कहानी और उपन्यास में मुख्य अंतर क्या है ?

उत्तर : कहानी में एक ओर एक घटना ही होती है लेकिन उपन्यास में प्रमुख और गौण कथाएँ होती हैं।

प्रश्न : उपन्यास पुस्तक से निकल कर पाठक के साथ कहा- कहाँ चलने लगता है ?

उत्तर : उपन्यास पुस्तक से निकल कर पाठक के साथ शौचालय, शयनगृह, चौराहा, सड़क सर्वत्र चलने लगता है।

प्रश्न : संसार की प्राचीनतम विधा कहानी क्यों है ?

उत्तर : कहानी अपनी कथा-वृत्ति के कारण संसार की प्राचीनतम विधा है।

अपठित गद्यांश (15)

प्रकृति और मनुष्य का संबंध ऐतिहासिक दृष्टि से काफी बाद में शुरू हुआ, क्योंकि प्रकृति पहले से थी, मनुष्य बाद में आया। लेकिन अपने विकास के क्रम में मनुष्य ने शीघ्र ही प्रकृति पर अपनी इच्छा आरोपित करनी चाही। और तब से, संघर्ष और स्वीकृति का एक लोमहर्षक नाटक मनुष्य और प्रकृति के बीच चला आ रहा है। आज भी मनुष्य प्रकृति का ही पुत्र है। जन्म, जीवन, यौवन, जरा, मरण आदि अपनी अनेक स्थितियों में वह आज भी प्राकृतिक नियमों से मुक्त नहीं हो सका है।

इसके बावजूद निरंतर उसकी चेष्टा यही रही है कि वह ज्ञान-विज्ञान की अपनी सामूहिक उद्यमशीलता के बल पर प्रकृति को पूर्णतः अपने वश में कर ले। यह इतिहास मनुष्य की विजय और प्रगति का इतिहास है। या उसकी पराजय और दुर्गति का, इसे वह स्वयं भी ठीक-ठीक नहीं समझ सका है। पर जिसे हम मनुष्य की जयगाथा कहकर पुलकित हो रहे हैं, वह असल में मनुष्य की पराजय और उसके आत्महनन की गाथा है।

प्रश्न : प्रस्तुत गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दें।

उत्तर : प्रकृति और मनुष्य का संबंध ।

प्रश्न : विकास के क्रम में मनुष्य ने किस पर और क्या आरोपित करना चाहा ?

उत्तर : विकास के क्रम में मनुष्य ने शीघ्र ही प्रकृति पर अपनी इच्छा आरोपित करनी चाही। 

प्रश्न : मनुष्य क्या ठीक-ठीक नहीं समझ सका है ?

उत्तर : मनुष्य अपनी ‘विजय और प्रगति’ या ‘पराजय और दुर्गति’ को भी ठीक-ठीक नहीं समझ सका है।

प्रश्न : मनुष्य की पराजय और आत्महनन की गाथा क्या है ?

उत्तर : प्रकृति और मनुष्य का संबंध ऐतिहासिक दृष्टि से काफी बाद में शुरू हुआ क्योंकि प्रकृति पहले से थी, मनुष्य बाद में आया लेकिन विकास के क्रम में मनुष्य में शीघ्र ही प्रकृति पर अपनी इच्छा आरोपित करनी चाही। आज भी मनुष्य प्रकृति का ही पुत्र है। जिसे हम मनुष्य की जयगाथा कहकर पुलकित हो रहे है, वह असल में मनुष्य की पराजय और उसके आत्महनन की गाथा है।

अपठित गद्यांश (16)

एक गुरुकुल था—विशाल और प्रख्यात उसके आचार्य भी बहुत विद्वान 1 थे। एक दिन आचार्य ने सभी छात्रों को आंगन में एकत्रित किया और उनके सामने एक समस्या रखी कि उन्हें अपनी कन्या के विवाह के लिए धन की आवश्यकता है। कुछ धनी परिवार के बालकों ने अपने पर से धन लाकर देने की बात कही। किंतु गुरुजी ने कहा कि इस तरह तो आपके घरवाले मुझे लालची समझेगे। लेकिन फिर गुरुजी ने एक उपाय बताया कि सभी विद्यार्थी चुपचाप अपने-अपने घरों से धन लाकर दें, मेरी समस्या सुलझ जाएगी। लेकिन यह बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए।

सभी छात्र तैयार हो गए। इस तरह गुरुजी के पास धन आना शुरू हो गया। लेकिन एक बालक कुछ नहीं लाया। गुरुजी ने उससे पूछा कि क्या उसे गुरु की सेवा नहीं करनी है? उसने उत्तर दिया, “ऐसी कोई बात नहीं है, लेकिन मुझे ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहाँ कोई देख न रहा हो।” गुरुजी ने कहा, “कभी तो ऐसा समय आता होगा जहाँ कोई न देख रहा हो।” गुरुजी का भी ऐसा ही आदेश था।

तब वह बालक बोला, “गुरुदेव ठीक है पर ऐसे स्थान में कोई रहे न रहे, मैं तो वहाँ रहता हूँ। कोई दूसरा देखे न देखे मैं स्वयं तो अपने कुकर्मों को देखता हूँ।” आचार्य ने गले लगाते हुए कहा, “तू मेरा सच्चा शिष्य है। क्योकि तूने गुरु के कहने पर भी चोरी नहीं की। यह तो सच्चे चरित्र का सबूत है। तू ही मेरी कन्या का सच्चा और योग्य वर है।” और, उन्होंने अपनी कन्या का विवाह उससे कर दिया। विद्या ऊँचे चरित्र का निर्माण करती है उसे उन्नति के शिखर पर ले जाती है।

प्रश्न : आचार्य ने अपने शिष्यों को बुलाकर क्या कहा ? 

उत्तर : आचार्य ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा कि उनकी कन्या के विवाह के लिए धन की आवश्यकता है। सभी विद्यार्थी अपने अपने घर से धन लाकर दें, किंतु इसका पता किसी को नही चलना चाहिए।

प्रश्न : कुछ न ला सकनेवाले शिष्य पर आचार्य क्यों प्रसन्न हुए ? 

उत्तर : कुछ न ला सकनेवाले शिष्य पर आचार्य इसलिए प्रसन्न हुए क्योंकि वही उनका सच्चा शिष्य था। वह चरित्रवान् था। गुरु के कहने पर भी उसने अपने घर में चोरी नहीं की।

प्रश्न : आचार्य को किस धन की खोज थी? वह उन्हें किस रूप में मिला ?

उत्तर : आचार्य को अपनी कन्या के लिए सच्चा और योग्य वररूपी धन की खोज थी। वह उन्हें एक सच्चे शिष्य के रूप में मिला। वह शिष्य सच्चा और चरित्रवान् था।

प्रश्न : गुरुकुल के आचार्य किस प्रकार के व्यक्ति थे ?

उत्तर : गुरुकुल के आचार्य बड़े विद्वान् थे। वे स्वयं चरित्रवान् और गुणज्ञ थे। वे अपने शिष्यों को भी सच्चा और सच्चरित्र देखना चाहते थे तथा उसी के अनुरूप शिक्षा भी देते थे ।

प्रश्न : लोग उन्नति के शिखर पर कैसे पहुँचते हैं ?

उत्तर : विद्या ऊँचे चरित्र का निर्माण करती है और उन्नति के शिखर पर ले जाती है ।

प्रश्न : इस गद्यांश का उचित शीर्षक दें।

उत्तर : शीर्षक: सद्विद्या का महत्त्व ।

अपठित गद्यांश (17)

सांप्रदायिक दंगों में भगत जी सड़क पर नाच नाचकर हिंदू-मुसलिम एकता के पद गाते थे। दोनों तरफ के गुंडों को अपनी चीलम पिलाते थे। उनके मन की भड़क सुनते और उनको सूक्ति शैली में उपदेश देते। एक बार भगत जी कहीं गायब हो गए। किसी मुसीबत में फँसे मुसलमान परिवार को किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने गए थे। हिंदुओं ने मुसलमानों और मुसलमानों ने हिंदुओं पर आशंका की बड़ी भीषण तैयारियाँ हुई, तभी भगत जी प्रकट हो गए और गलियों में फूटा कनस्तर बजा-बजाकर गाते फिरे- -या जग अंधा मैं केहि समुझावों ।

प्रश्न : भगत जी किस प्रकार के गुंडों को उपदेश देते थे ?

उत्तर : भगत जी सांप्रदायिक दंगों के समय सड़क पर नाच-नाचकर हिंदू-मुसलिम एकता के पद गाते थे। वे सांप्रदायिक दंगों को भड़कानेवाले दोनों तरफ के गुंडों को ‘सूक्ति’ शैली में उपदेश देते थे ।

प्रश्न : भगत जी के गायब हो जाने का क्या कारण था ?

उत्तर : भगत जी के गायब हो जाने का यह कारण था कि कोई मुसलमान परिवार मुसीबत में फँस गया था, जिन्हें वे बचाने के खयाल से किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने गए थे।

प्रश्न : भगत जी के गायब हो जाने से समाज में क्या प्रतिक्रिया हुई ? 

उत्तर : भगत जी के गायब हो जाने से समाज में यह प्रतिक्रिया हुई कि हिंदू मुसलमानों को और मुसलमान हिंदुओं को शंका की दृष्टि से देखने लगे। दोनों ओर से दंगे की भीषण तैयारियाँ हुई।

प्रश्न: ‘या जग अंधा मैं केहि समुझावों’ का तात्पर्य क्या है ?

उत्तर : “या जग अंधा मैं केहि समुझावों’ का तात्पर्य है कि जब पूरा संसार ही अंधा अर्थात् मूर्ख अज्ञानी है तो फिर किसे कुछ समझाया जाए। मूर्खों को समझाना सर्वथा व्यर्थ है

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